आज की कविता



आज की कविता



जलाकर हमें जो 
समझ रहे स्वयं को सुरक्षित
भूल है  उनकी यह
हमारे अन्तरमन की आग 
फैल जाएगी उनके चारो ओर
कर देगी उन्हें धुएं से सराबोर
नाक और मुँह से कड़वा धुआं
जब पहुँच जाएगा उनके पेट में
तब,
हम तो मरेंगे चीखों के साथ
अग्नि में जलकर
मगर वो खांसते हुए
मौत की भीख मांगते हुए
रह जायेंगे फिर ज़िन्दे
हमारी लाशे गिनने के लिए

Comments

Popular posts from this blog

हिलाल साहिब नहीं रहे

अमनिका

मौन/कहानी