Sunday, 18 November 2012

मेरी चार कविताएं


मेरी चार कविताएं


1

हाँ मैं,
दिये सा जलना चाहता हूँ ,
बर्फ सा पिघलना चाहता हूँ ,
रात दिन घुटघुट कर भी
तेरे लिये जीना चाहता हूँ ,
रोने और हंसने की बात नहीं
अपने पराये की पहचान नहीं
फिर भी तेरे, सिर्फ तेरे लिये
लिख-लिखकर गाना चाहता हूँ ,
खुद को खुद ही से मिलाना है ,
और तुझे भी अपना बनाना है ,
देख ले मुझे सारी दुनिया,
अंधेरों में चमकना चाहता हूँ ,
गुनहगार मैं नहीं तो कौन है ?
तू हमराज नहीं तो कौन है ?
तेरे मेरे गुनाहों की सब सजा
मैं ही पाना चाहता हूँ ,
रात सा ढला हूँ मैं ,
सूरज सा चला हूँ मैं ,
तेरे प्यार की खातिर
कितना जला हूँ मैं
तू कितना पास है मेरे?
फिर भी हाथ नहीं आता
दूर और दूर चला जाता
तुझे पाने के लिये अब
दिन सा ढलना चाहता हूँ।


2

बकरी का नन्हा सा बच्चा
बकरी के आगे आगे चरता
बकरी तब तक चरती रहती
जब तक बच्चे का पेट भरता

अगले घुटने टेक बकरी
बच्चे को देख देख चरती
नन्हा और प्यारा बच्चा
निरन्तर उछल कूद करता

पतली टांगो वाला बच्चा
जब माँ के साथ घर जाता
बकरी खूंटे से बंध जाती
बच्चा दूध को ललचाता

बकरी आँखों में नीर लिए
खड़ी रहती थनों में दूध लिए
मालिक लोटा लिए आता
बच्चा उछल उछल जाता

बच्चे का बंधन खुल जाता
वो अपने होंठों में थन दबाता
बकरी धन्य हो जाती
बच्चा भी खुश हो जाता

तभी बच्चे को मालिक हटाता
बकरी का दूध चट कर जाता
बकरी मजबूर रह जाती
बच्चा भी बेबस हो जाता

बच्चा खा पी बड़ा हो जाता
तब तक छोटा भाई आ जाता
बकरी की आँखों में पानी आता
बच्चा रहस्य नहीं समझ पाता

जब मालिक त्यौहार मनाता
बच्चे की गरदन पर छुरा आता
तब माँ की आँखों का पानी
उसको अच्छी तरह समझ आता


3

परिंदों के कूकने, कूलने
या चहचहाने की आवाज़
सोचने पर कर देती है मजबूर
उनके फड़फड़ाने,
दिवार से टकराने की आवाज़
दिवारें,
दो वस्तुओं के बीच की नहीं
बुलन्द इमारतों की खंडहर दिवारें

शान्ति मिलती है
इन भूतहा दिवारों में
जैसे  कोई आत्मा,
अस्तित्व तलाशती है
इन खंडहर दिवारों में
आह!
हवा का तेज़ और ठण्डा झौंका
बड़े और भारी पत्थरों से टकराता
दीवारों पे धूल से इबारत लिखता
अपढ, रहस्यमयी और
अनजानी इबारत
पढ लेती हैं,
खंडहर हुई विशाल इमारत
घटनाओं - दुर्घटनाओं की कहानी
पाप और पुण्य की अन्तर कहानी
इन दिवारों को लाँघती हुई
फैल जाती है दावानल की भाँति।

काल जिसे रोक नहीं पाता
और इन
छोटी - बड़ी कहानियों का
खंडहर हुई दिवारों का
विशाल इतिहास बन जाता है।


4

तुम्हारा क्रोध,
मुझे डरा नहीं सकता,
तुम्हारे हाथ का पत्थर
नष्ट नहीं कर पाएगा,
जैसा है वैसा ही कहूँगा,
चेहरे के बदलते भावों को,
छिपा नहीं पाओंगे
और अगर पत्थर मारकर
ग़र तोड़ भी पाओगे
आईना हूँ
अपने ही हज़ार अक्स पाओगे

2 comments:

  1. bahut achi rachnayen hai ,bdhai :)
    ek post me ydi ek hi rchna ho to behtar ,aap ka blog dekh kar kgushi huee,likhte rhiye ,umda likhte hai Aman bhai aap

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  2. Shukriya Avanti Bahan. aapka sujhav mana jaega.

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