Friday, 16 November 2012

मेरी चार ग़ज़लें





मेरी चार ग़ज़लें

1

उदास रातों को देखा है मैंने।
तुझे बहुत पास देखा है मैंने।।
जब भी जी चाहा चूम लिया।
हर इक शय में देखा है मैंने।।
नफ़रत करने के लायक नहीं।
बड़े प्यार से तुझे देखा है मैंने।।
सच बता इतना हँसता क्यों है।
दर्द तेरे सीने में देखा है मैंने।।
जाने का नाम मत लेना ‘अमन’।
हथेली में सफ़र देखा है मैंने।।

2

हर बार मैं ही हारा हूँ।
छप्पर का सहारा हूँ।।
टूटा हूँ मेरी किस्मत।
दरिया का किनारा हूँ।।
यूँ ही देखता नही कोई।
ख़ूबसूरत नजारा हूँ।।
तुझे धोखा हुआ होगा।
गिनती नहीं पहाड़ा हूँ।।
बेअम्नी इस दुनिया में।
‘अमन’ बनके हारा हूँ।।

3

मुझे जीने का मौका तो दिया होता।
फिर चाहे सारा लहु पी लिया होता।।
मेरी साफ़गोई की सजा मिली मुझे।
काश मैंने होंठों को सी लिया होता।।
इल्ज़ाम लगाके औक़ात दिखा दी।
मेरा हिस्सा भी तूने ले लिया होता।।
मुझसे पीने के लिये कहा तो होता।
अगर ज़हर था मैंने पी लिया होता।।
राम सा वनवास काट लेता ‘अमन’।
बाइज्ज़त घर से निकाल दिया होता।।

4

दुनिया को दहलीज़ बना लिया है।
हर चीज़ को नाचीज़ बना लिया है।।
हौसला देखलें अब देखने वाले।
आसमां को छत बना लिया है।।
गिरने का अब डर भी नही रहा।
धरती को बिछोना बना लिया है।।
मौत से भी अब डर नहीं लगता।
मौत को सहारा बना लिया है।।
चाहे तो चल साथ मेरे ‘अमन’।
दुश्मनों को हमराह बना लिया है।।

- अमन कुमार त्यागी

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