Thursday, 15 November 2012

गुलाबों का बादशाह

कहानी

गुलाबों का बादशाह


-अमन कुमार त्यागी


आसपास के सभी लोग उसे गुलाबों के बाह के रूप में ही जानते थे। उसका असल नाम क्या है? अब तो स्वयं उसे भी स्मरण नहीं रहा। मुश्किल से तीन वर्ष का रहा होगा, जब उसके माँ-बाप ने उससे सदा के लिए विदा ले ली थी। इस भरी दुनिया में वह नितान्त अकेला था। उसकी उम्र लगभग पैंसठ वर्ष हो चुकी है। विवाह के अनेक प्रस्तावों के बावजूद उसने कुंवारा ही रहना उचित समझा। मन लगाने के लिए उसके पास बड़ा सा गुलाबों का बगीचा है। कहा जाता है कि जब उसके माता-पिता ने उससे विदा ली थी, तब वह इसी बगीचे में था। यह बगीचा उस वक्त उतना खूबसूरत नहीं था, जितना कि आज है। तब व्याधियां भी अधिक थीं और उसके माता-पिता इस बगीचे की देखभाल भी उचित प्रकार से नहीं कर सके थे। पड़ोसियों के जानवर इस बगीचे में आते। जहाँ अच्छा लगता मुँह मारते और जहाँ मन करता गोबर करते और फिर चले जाते। हद तो ये हो गयी कि बाद में एक दो सांडों ने इस सुन्दर बगीचे को अपना आसियाना ही बना लिया। गुलाबों के बादशाह के माता-पिता इन सांडों से मरते दम तक अपने बगीचे को आजाद नहीं करा सके। आज गुलाबों का बादशाह अपने बगीचे को साफ-सुथरा रखता है। क्या मजाल एक भी पड़ोसी जानवर उसके बगीचे में घुस आए। उसके बगीचे में आज तरह-तरह के गुलाब हैं, जो दूर तक अपनी खुशबू बिखेरते हैं। गुलाबों का बादशाह कहता है- "मैं अपने बगीचे में किसी को घुसने नहीं देता, और मेरे गुलाबों की खूशबु को कोई रोक नहीं पाता।"    

यह कहते हुए वह कभी-कभी गम्भीर भी जाता है। स्मृति में खोया वह कहता है- ‘‘मेरे माँ-बाप के जाने के बाद यहाँ बहुत लोगों में आपसी झगड़े हुए। कोई इस बगीचे में अपने घर का कूड़ा डालना चाहता था, तो कोई उपले पाथने के लिए पथवारा ही बनाना चाहता था। सब अपने-अपने तरीके से कब्जाने का प्रयास कर रहे थे।’’ बताते-बताते वह एकाएक मुस्करा उठता है। वह अपने आप से सवाल करता है -‘‘परन्तु हुआ क्या?’’ फिर अपने आप ही जवाब भी देता है- ‘‘बर्बाद हो गये सब। आपसी झगड़ों में कई मारे गये, जो बचे वो अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं।’’     

गुलाबों का यह बादशाह आपसे बातें करते-करते अचानक उठता है और जब वापिस आता है तो उसके हाथ में गुलाब की दो चार पंखुड़ियाँ और पत्तों के सिवा कुछ नहीं होता। आप उससे प्रश्न भी नहीं कर पाएंगे कि वह स्वयं ही उत्तर दे देता है- "बुरा नहीं मानिये साहब, मैं लापरवाह नहीं हूँ और न ही मुझे अपने बगीचे में किसी प्रकार की गन्दगी ही पसन्द है।"   


गुलाबों का यह बादशाह बड़ा ही विचित्र जीव है। वह गुलाबों की कटाई-छंटाई नहीं करता और एक पत्ते को भी जमीन पर नहीं गिरे रहने देता। पत्तों और पंखुड़ियों को वह एक गड्ढे में डालता जाता है। जिसमें ये पत्ते और पंखुड़ियाँ सड़कर खाद बन जाती हैं। वह बताता है- "बगीचे में जो पत्ते और पंखुड़ियां बेकार हो जाती हैं, मैं उनसे भी काम लेता हूँ।"   


गुलाबों के इस बादशाह की विचित्रता तो देखिए कि इसके शरीर का एक भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहाँ कोई निशान न हो। हर तरफ से कटा-फटा। अभी भी कई अंगो से खून टपक रहा है। वह धरती से कुछ मिट्टी उठाता है और खून निकलने वाली जगहों पर मलते हुए मुस्कुराता है। "क्या बताऊँ साहब?" जगह-जगह कांटे चुभ जाते हैं। बताते हुए वह गम्भीर हो जाता है और पूछता है- "आपको तो यहाँ के कांटे नहीं चुभे साहब?"  आप जवाब भी नहीं दे पाते कि उससे पहले ही वह बोल उठेगा- "आप यहाँ की खुशबू लीजिए जनाब, यहाँ के कांटे आपको नहीं चुभेंगे।"

      

गुलाब का फूल होता ही प्यारा है। उसे देखकर भला किसका जी नहीं ललचाता। बहुत से व्यक्ति होते हैं, जो गुलाब के ताजे फूल को अपने कोट में लगाने को अपनी शान समझते हैं। बहुत सी यौवनाएं होती हैं, जो गुलाब के फूल को अपने केशों में लगाकर प्रफुल्लित हो उठती हैं। बच्चों को नहीं पता गुलाब क्या होता है, मगर उन्हें भी गुलाब का फूल सबसे अधिक प्रिय होता है। आज कल तो हाल ये है कि हर कोई गुलाब सा दिखने के लिए ब्यूटिपार्लर के धंधे में चार चाँद लगा रहा है। यहाँ तक कि सारा संसार गुलाबी हो जाने को तत्पर है।  इस गुलाबी बगीचे को देखकर जो आनन्द आता है। वह अद्वितीय है। बाहरी लोग इस बगीचे की तुलना में अनेकों बगीचे लगा रहे हैं। यहाँ तक कि खूबसूरत रात को गुलाबी रात और खूबसूरत मौसम को गुलाबी मौसम भी कहा जाने लगा है। अंग्रेजों ने इसकी खूबसूरती को देखते हुए ‘पिंक’ शब्द दिया है। पिंक नाइट, पिंक कलर, पिंक वल्र्ड और न जाने क्या-क्या?   


गुलाबों के बादषाह के इसी बगीचे में विभिन्न प्रकार के गुलाब हैं। गुलाबों का बादशाह बातों-बातों में बताता है- ‘‘इस बगीचे का हर गुलाब आपको एक से बढ़कर एक लगेगा। मगर...।’’ कहते-कहते गुलाबों के बादशाह की जुबान लड़खड़ाने लगती है। वह चन्द पलों के बाद नियंत्रित हो जाता है और फिर किसी भयानक दर्द को छिपाते हुए मुस्कुराने का प्रयास करता हुआ कहता है- "ठीक है, अब आप जाइये, मुझे बहुत काम करने हैं।" 


मैं इस बगीचे में घूमकर गुलाबों को देखना चाहता हूँ। यह बात कहते ही वह जमकर खड़ा हो जाता है और दृढ़ता के साथ कहता है- "बस दूर से ही देखना, कोई मेरे गुलाबों को छूकर देखे, ये मैं सहन नहीं कर पाऊंगा।"  

      "जी अच्छा मैं दूर से ही देखूंगा।" सहमती के साथ ही वह भी अपनी सहमति दे देता है।    


अब उसके साथ उसके खूबसूरत बगीचे में घूम रहे हैं। वह जिस पथ पर चल रहा है उसे राजपथ कहता है। वह बताता है, यहाँ का हर पथ मेरे राजमहल तक जाता है। गुलाबों का बादशाह बगीचे के बीचो-बीच तक झोपड़ी में रहता है, जिसे वह अपना राजमहल कहता है।  


वह अपने गुलाबों की तारीफ करते हुए थकता नहीं। उसके इस बगीचे में सम्पूर्ण भारत में पाये जाने वाले गुलाब मौजूद हैं। अभी पिछले दिनों उसने एक गुलाब विदेश से भी मंगवाया है। इसके बारे में वह कहता है- ‘‘मेरा यह गुलाब इतना सोहणा है कि सभी के मन को मोह लेता है।’’ 

    

एक और गुलाब की ओर इशारा करते हुए वह बताता है- ‘‘यह गुलाब देखो, मोटा है मगर इसकी माया निराली है। जो भी इसे एक बार देख ले, वो इसे बार बार देखना पसंद करता है। इसी के बराबर में एक और नरम-मुलायमसा गुलाब दिख रहा है, मगर यह उतना मुलायम भी नहीं है, जितना कि देखने में लगता है। और उससे आगे वो पीछे वाला, देखो, उस गुलाब की सदा जय-जय होती है, और उसके बाये, वो सफेद वाला गुलाब बड़ा ही ममतामयी है।   


वह अपने गुलाबों की तारीफें करता जाता है और देखने वाला हैरत से देखता है। वह प्रसन्नचित्त हो कहता है-‘‘वह देख रहे हैं आप, काला गुलाब, मैं उसकी जड़ में प्रतिदिन मांड डालता हूँ। उसका वृक्ष बड़ा है। इतना बड़ा कि उसके नीचे दो-चार बालक भी आराम से खेल सकते हैं। और उसी के बराबर में वह लम्बा सा गुलाब, इसे मैं राजा कहता हूँ। यह किसी मोबाइल टावर की तरह लम्बा लगता है। राजा के पीछे वाला गुलाब बड़ा प्यारा है। यह बड़ा सुख देता है। इतना सुख जो रामराज में ही मिला हो सकता है।      


एकाएक गुलाबों का बादशाह पीछे मुड़ता है और एक पौधे की ओर इषारा करते हुए कहता है-‘‘यह गुलाब कमाल का है, कहा जाता है कि ये दिगदिगन्तर विजयी है।’’ बताते हुए वह अपनी झौंपड़ी की ओर बढ़ता है। जहाँ अनेकों छोटे-छोटे गुलाबों के पौधे उग रहे थे। जिन्हें देखकर गुलाबों का बादशाह गर्व के साथ कहता है-‘‘ये मेरे बगीचे का भविष्य हैं।’’   


बात करते हुए वह झौंपड़ी में घुस जाता है। बाहर से खूबसूरत लगने वाली झौंपड़ी अन्दर से बड़ी ही अस्तव्यस्त लग रही थी। सभी सामान दाये-बाये बिखरा पड़ा था। प्रतीत हो रहा था कि यहाँ कोई दंगा-फसाद हुआ है। गुलाबों का बादशाह मुस्कुराता हुआ बताता है-‘‘यही मेरा महल है, जहाँ बैठकर मैं अपने बगीचे को संवारने की योजनाएं बनाता हूँ।’’  

आप गुलाबों के बादशाह की बातें सुनकर आष्चर्य में पड़ सकते हैं। कभी वह आम आदमी नजर आता है और कभी बड़ा दाषर्निक।   


झौंपड़ी की विषेषता बताते-बताते गुलाबों के बादशाह के हलक से चीख निकल पड़ती है और वह वहीं जमीन पर बैठ जाता है। उसके दोनो हाथ अपने दाये पैर के तलवे की ओर बढ़ते हैं। उसके तलवे में एक कांटा चुभा था। कांटा बड़ा ही कसैला था। वह उस कांटे को निकालता है और एक तरफ फेंक देता है। उस स्थान पर कांटो का ढेर है। वह पुनः मुस्कुराने का प्रयत्न करते हुए कहता है-‘‘आप तो गुलाबों की खुशबू लीजिये साहब! कांटे इस झौंपड़ी को मुबारक।’’


No comments:

Post a Comment