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Showing posts from November, 2012

फायकू

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फायकू

1
गुनाहों की हर तरकीब मुझे आजमाने दो तुम्हारे लिये
2
जमाने भर की दुआ तुम्हें देता हूँ तुम्हारे लिये
3
सच सबके सामने बोला और पिट गया तुम्हारे लिये
4
रात दिन दिन रात करता रहा काम तुम्हारे लिये
5
यहां वहां जहां तहां खुद को ढूंढा तुम्हारे लिये
6
तुम आओ ना आओ हम तो आयेंगे तुम्हारे लिये
7
दो सौ फायकू लिखो किताब मुफ्त छपे तुम्हारे लिये
8
आज का दिन हुआ तुम्हारे ही नाम तुम्हारे लिये
9
जेब में नहीं कुछ दिल राजा है तुम्हारे लिये
10
राजनीति हो गयी छलिया नेता सब बेमाने तुम्हारे लिये
11
रात हो गयी अंधियारी जैसे भारतीय राजनीति तुम्हारे लिये
12
आसमान में कड़कती बिजली बेतरतीब धड़कता दिल तुम्हारे लिये
13
मतदाताओं पीनी है चाय संसद में जाकर तुम्हारे लिये
14
मैं करता हूं प्यार बार बार यार तुम्हारे लिये
15
जवां दिलों की धड़कन बे मतलब नहीं तुम्हारे लिये
16
दिल विल प्यार व्यार सब हैं बेकरार तुम्हारे लिये
17
मुझे जल्दी करने दो धैर्य छोड़ दिया तुम्हारे लिये
18
दारू दारू करता है दीवाना जमकर पीता तुम्हारे लिये
19
दोहा चैपाई गीत ग़ज़ल कुछ भी लिखूं तुम्हारे लिये
20
नव प्रभात नव बेला शुभ शुभ हो तुम्हारे लिये

आज की कविता

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आज की कविता


जलाकर हमें जो  समझ रहे स्वयं को सुरक्षित भूल है  उनकी यह हमारे अन्तरमन की आग  फैल जाएगी उनके चारो ओर कर देगी उन्हें धुएं से सराबोर नाक और मुँह से कड़वा धुआं जब पहुँच जाएगा उनके पेट में तब, हम तो मरेंगे चीखों के साथ अग्नि में जलकर मगर वो खांसते हुए मौत की भीख मांगते हुए रह जायेंगे फिर ज़िन्दे हमारी लाशे गिनने के लिए

मेरी चार कविताएं

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मेरी चार कविताएं

1

हाँ मैं,
दिये सा जलना चाहता हूँ ,
बर्फ सा पिघलना चाहता हूँ ,
रात दिन घुटघुट कर भी
तेरे लिये जीना चाहता हूँ ,
रोने और हंसने की बात नहीं
अपने पराये की पहचान नहीं
फिर भी तेरे, सिर्फ तेरे लिये
लिख-लिखकर गाना चाहता हूँ ,
खुद को खुद ही से मिलाना है ,
और तुझे भी अपना बनाना है ,
देख ले मुझे सारी दुनिया,
अंधेरों में चमकना चाहता हूँ ,
गुनहगार मैं नहीं तो कौन है ?
तू हमराज नहीं तो कौन है ?
तेरे मेरे गुनाहों की सब सजा
मैं ही पाना चाहता हूँ ,
रात सा ढला हूँ मैं ,
सूरज सा चला हूँ मैं ,
तेरे प्यार की खातिर
कितना जला हूँ मैं
तू कितना पास है मेरे?
फिर भी हाथ नहीं आता
दूर और दूर चला जाता
तुझे पाने के लिये अब
दिन सा ढलना चाहता हूँ।


2

बकरी का नन्हा सा बच्चा
बकरी के आगे आगे चरता
बकरी तब तक चरती रहती
जब तक बच्चे का पेट भरता

अगले घुटने टेक बकरी
बच्चे को देख देख चरती
नन्हा और प्यारा बच्चा
निरन्तर उछल कूद करता

पतली टांगो वाला बच्चा
जब माँ के साथ घर जाता
बकरी खूंटे से बंध जाती
बच्चा दूध को ललचाता

बकरी आँखों में नीर लिए
खड़ी रहती थनों में दूध लिए
मालिक लोटा लिए आता
बच्चा उछल उछल जाता

बच्चे का…

मेरी चार ग़ज़लें

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मेरी चार ग़ज़लें
1
उदास रातों को देखा है मैंने। तुझे बहुत पास देखा है मैंने।। जब भी जी चाहा चूम लिया। हर इक शय में देखा है मैंने।। नफ़रत करने के लायक नहीं। बड़े प्यार से तुझे देखा है मैंने।। सच बता इतना हँसता क्यों है। दर्द तेरे सीने में देखा है मैंने।। जाने का नाम मत लेना ‘अमन’। हथेली में सफ़र देखा है मैंने।।
2
हर बार मैं ही हारा हूँ। छप्पर का सहारा हूँ।। टूटा हूँ मेरी किस्मत। दरिया का किनारा हूँ।। यूँ ही देखता नही कोई। ख़ूबसूरत नजारा हूँ।। तुझे धोखा हुआ होगा। गिनती नहीं पहाड़ा हूँ।। बेअम्नी इस दुनिया में। ‘अमन’ बनके हारा हूँ।।
3
मुझे जीने का मौका तो दिया होता। फिर चाहे सारा लहु पी लिया होता।। मेरी साफ़गोई की सजा मिली मुझे। काश मैंने होंठों को सी लिया होता।। इल्ज़ाम लगाके औक़ात दिखा दी। मेरा हिस्सा भी तूने ले लिया होता।। मुझसे पीने के लिये कहा तो होता। अगर ज़हर था मैंने पी लिया होता।। राम सा वनवास काट लेता ‘अमन’। बाइज्ज़त घर से निकाल दिया होता।।
4
दुनिया को दहलीज़ बना लिया है। हर चीज़ को नाचीज़ बना लिया है।। हौसला देखलें अब देखने वाले। आसमां को छत बना लिया है।। गिरने का अब डर भी नही रहा। धरती को बिछोना बना लिया है।। मौत से …

हिलाल साहिब नहीं रहे

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शख्सियत
हिलाल साहिब नहीं रहे
डा. वीरेन्द्र पुष्पक का 15 नवम्बर को करीब 7 बजे (रात्रि) फोन आया। वह सिर्फ यही कह पाये कि हिलाल साहिब नहीं रहे। इस एक वाक्य ने अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी। यह कहने को तो एक वाक्य ही था मगर एक युग को समेटे हुए। एक नहीं अनेक शायरों ने हिलाल का जलाल देखा है। हिलाल साहिब का भले ही विदा होते हुए नाम हिलाल ही रहा हो मगर वो पूरी जरह से जलाल थे। तन्जो मिज़ाह का यह शायर हिन्दुस्तान की सरहदों से बाहर पाकिस्तान, इराक, कुवैत, आस्ट्रेलिया आदि में भी अपने उसी जलाल के साथ जाना-पहचाना गया जिस जलाल के साथ हिन्दुस्तान में। हिलाल स्योहारवी को वर्ष 1989 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा मिर्जा गालिब सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं।
हिलाल साहिब के असमय चले जाने पर दुखी हो डा. वीरेन्द्र पुष्पक कहते हैं- वयोवृद्ध एवं अंतर्राष्ट्रीय शायर हिलाल स्योहारवी की नई पुस्तक ‘‘नुक्ता ए नजर’’ जो कि परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद से प्रकाशित हुई है, का विमोचन एवं जश्ने हिलाल का आयोजन करने का सपना अधूरा रह गया।


स्योहारा में जन्में हबीबुर्रहमान पुत्र फजल हक की शिक्षा स्योहारा और अलीगढ़ में सम्पन…

गुलाबों का बादशाह

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कहानीगुलाबों का बादशाह
-अमन कुमार त्यागी
आसपास के सभी लोग उसे गुलाबों के बाह के रूप में ही जानते थे। उसका असल नाम क्या है? अब तो स्वयं उसे भी स्मरण नहीं रहा। मुश्किल से तीन वर्ष का रहा होगा, जब उसके माँ-बाप ने उससे सदा के लिए विदा ले ली थी। इस भरी दुनिया में वह नितान्त अकेला था। उसकी उम्र लगभग पैंसठ वर्ष हो चुकी है। विवाह के अनेक प्रस्तावों के बावजूद उसने कुंवारा ही रहना उचित समझा। मन लगाने के लिए उसके पास बड़ा सा गुलाबों का बगीचा है। कहा जाता है कि जब उसके माता-पिता ने उससे विदा ली थी, तब वह इसी बगीचे में था। यह बगीचा उस वक्त उतना खूबसूरत नहीं था, जितना कि आज है। तब व्याधियां भी अधिक थीं और उसके माता-पिता इस बगीचे की देखभाल भी उचित प्रकार से नहीं कर सके थे। पड़ोसियों के जानवर इस बगीचे में आते। जहाँ अच्छा लगता मुँह मारते और जहाँ मन करता गोबर करते और फिर चले जाते। हद तो ये हो गयी कि बाद में एक दो सांडों ने इस सुन्दर बगीचे को अपना आसियाना ही बना लिया। गुलाबों के बादशाह के माता-पिता इन सांडों से मरते दम तक अपने बगीचे को आजाद नहीं करा सके। आज गुलाबों का बादशाह अपने बगीचे को साफ-सुथरा रखता ह…