Monday, 26 November 2012

फायकू


फायकू



1

गुनाहों की हर तरकीब
मुझे आजमाने दो
तुम्हारे लिये

2

जमाने भर की दुआ
तुम्हें देता हूँ
तुम्हारे लिये

3

सच सबके सामने बोला
और पिट गया
तुम्हारे लिये

4

रात दिन दिन रात
करता रहा काम
तुम्हारे लिये

5

यहां वहां जहां तहां
खुद को ढूंढा
तुम्हारे लिये

6

तुम आओ ना आओ
हम तो आयेंगे
तुम्हारे लिये

7

दो सौ फायकू लिखो
किताब मुफ्त छपे
तुम्हारे लिये

8

आज का दिन हुआ
तुम्हारे ही नाम
तुम्हारे लिये

9

जेब में नहीं कुछ
दिल राजा है
तुम्हारे लिये

10

राजनीति हो गयी छलिया
नेता सब बेमाने
तुम्हारे लिये

11

रात हो गयी अंधियारी
जैसे भारतीय राजनीति
तुम्हारे लिये

12

आसमान में कड़कती बिजली
बेतरतीब धड़कता दिल
तुम्हारे लिये

13

मतदाताओं पीनी है चाय
संसद में जाकर
तुम्हारे लिये

14

मैं करता हूं प्यार
बार बार यार
तुम्हारे लिये

15

जवां दिलों की धड़कन
बे मतलब नहीं
तुम्हारे लिये

16

दिल विल प्यार व्यार
सब हैं बेकरार
तुम्हारे लिये

17

मुझे जल्दी करने दो
धैर्य छोड़ दिया
तुम्हारे लिये

18

दारू दारू करता है
दीवाना जमकर पीता
तुम्हारे लिये

19

दोहा चैपाई गीत ग़ज़ल
कुछ भी लिखूं
तुम्हारे लिये

20

नव प्रभात नव बेला
शुभ शुभ हो
तुम्हारे लिये

21

कमाल हो गया है
साथ तुम्हारा मिला
तुम्हारे लिये

22

सच कहूं रात सोया
नहीं जागता रहा
तुम्हारे लिये

23

सपने में भी आते 
फायकू निराले निराले
तुम्हारे लिये

24

जीतकर हार जाता हूं
हारकर जीतता हूं
तुम्हारे लिये

25

हो गयी है पीर
पर्वत सी विशाल
तुम्हारे लिये

26

जिन्दगी बहुत है मगर
खुशियां दो चार
तुम्हारे लिये

27

कविता रसीली है मगर
फायकू सी कहां
तुम्हारे लिये

28

कवियों फायकू कहो यह
मजे से भरपूर
तुम्हारे लिये

29

नैट वैट गैट जैट
सब के सब
तुम्हारे लिये

30

आज फिर कहना है
फायकू दो चार
तुम्हारे लिये

31

रोके से रुके नहीं
फायकू आते जायें 
तुम्हारे लिये

Monday, 19 November 2012

आज की कविता



आज की कविता



जलाकर हमें जो 
समझ रहे स्वयं को सुरक्षित
भूल है  उनकी यह
हमारे अन्तरमन की आग 
फैल जाएगी उनके चारो ओर
कर देगी उन्हें धुएं से सराबोर
नाक और मुँह से कड़वा धुआं
जब पहुँच जाएगा उनके पेट में
तब,
हम तो मरेंगे चीखों के साथ
अग्नि में जलकर
मगर वो खांसते हुए
मौत की भीख मांगते हुए
रह जायेंगे फिर ज़िन्दे
हमारी लाशे गिनने के लिए

Sunday, 18 November 2012

मेरी चार कविताएं


मेरी चार कविताएं


1

हाँ मैं,
दिये सा जलना चाहता हूँ ,
बर्फ सा पिघलना चाहता हूँ ,
रात दिन घुटघुट कर भी
तेरे लिये जीना चाहता हूँ ,
रोने और हंसने की बात नहीं
अपने पराये की पहचान नहीं
फिर भी तेरे, सिर्फ तेरे लिये
लिख-लिखकर गाना चाहता हूँ ,
खुद को खुद ही से मिलाना है ,
और तुझे भी अपना बनाना है ,
देख ले मुझे सारी दुनिया,
अंधेरों में चमकना चाहता हूँ ,
गुनहगार मैं नहीं तो कौन है ?
तू हमराज नहीं तो कौन है ?
तेरे मेरे गुनाहों की सब सजा
मैं ही पाना चाहता हूँ ,
रात सा ढला हूँ मैं ,
सूरज सा चला हूँ मैं ,
तेरे प्यार की खातिर
कितना जला हूँ मैं
तू कितना पास है मेरे?
फिर भी हाथ नहीं आता
दूर और दूर चला जाता
तुझे पाने के लिये अब
दिन सा ढलना चाहता हूँ।


2

बकरी का नन्हा सा बच्चा
बकरी के आगे आगे चरता
बकरी तब तक चरती रहती
जब तक बच्चे का पेट भरता

अगले घुटने टेक बकरी
बच्चे को देख देख चरती
नन्हा और प्यारा बच्चा
निरन्तर उछल कूद करता

पतली टांगो वाला बच्चा
जब माँ के साथ घर जाता
बकरी खूंटे से बंध जाती
बच्चा दूध को ललचाता

बकरी आँखों में नीर लिए
खड़ी रहती थनों में दूध लिए
मालिक लोटा लिए आता
बच्चा उछल उछल जाता

बच्चे का बंधन खुल जाता
वो अपने होंठों में थन दबाता
बकरी धन्य हो जाती
बच्चा भी खुश हो जाता

तभी बच्चे को मालिक हटाता
बकरी का दूध चट कर जाता
बकरी मजबूर रह जाती
बच्चा भी बेबस हो जाता

बच्चा खा पी बड़ा हो जाता
तब तक छोटा भाई आ जाता
बकरी की आँखों में पानी आता
बच्चा रहस्य नहीं समझ पाता

जब मालिक त्यौहार मनाता
बच्चे की गरदन पर छुरा आता
तब माँ की आँखों का पानी
उसको अच्छी तरह समझ आता


3

परिंदों के कूकने, कूलने
या चहचहाने की आवाज़
सोचने पर कर देती है मजबूर
उनके फड़फड़ाने,
दिवार से टकराने की आवाज़
दिवारें,
दो वस्तुओं के बीच की नहीं
बुलन्द इमारतों की खंडहर दिवारें

शान्ति मिलती है
इन भूतहा दिवारों में
जैसे  कोई आत्मा,
अस्तित्व तलाशती है
इन खंडहर दिवारों में
आह!
हवा का तेज़ और ठण्डा झौंका
बड़े और भारी पत्थरों से टकराता
दीवारों पे धूल से इबारत लिखता
अपढ, रहस्यमयी और
अनजानी इबारत
पढ लेती हैं,
खंडहर हुई विशाल इमारत
घटनाओं - दुर्घटनाओं की कहानी
पाप और पुण्य की अन्तर कहानी
इन दिवारों को लाँघती हुई
फैल जाती है दावानल की भाँति।

काल जिसे रोक नहीं पाता
और इन
छोटी - बड़ी कहानियों का
खंडहर हुई दिवारों का
विशाल इतिहास बन जाता है।


4

तुम्हारा क्रोध,
मुझे डरा नहीं सकता,
तुम्हारे हाथ का पत्थर
नष्ट नहीं कर पाएगा,
जैसा है वैसा ही कहूँगा,
चेहरे के बदलते भावों को,
छिपा नहीं पाओंगे
और अगर पत्थर मारकर
ग़र तोड़ भी पाओगे
आईना हूँ
अपने ही हज़ार अक्स पाओगे

Friday, 16 November 2012

मेरी चार ग़ज़लें





मेरी चार ग़ज़लें

1

उदास रातों को देखा है मैंने।
तुझे बहुत पास देखा है मैंने।।
जब भी जी चाहा चूम लिया।
हर इक शय में देखा है मैंने।।
नफ़रत करने के लायक नहीं।
बड़े प्यार से तुझे देखा है मैंने।।
सच बता इतना हँसता क्यों है।
दर्द तेरे सीने में देखा है मैंने।।
जाने का नाम मत लेना ‘अमन’।
हथेली में सफ़र देखा है मैंने।।

2

हर बार मैं ही हारा हूँ।
छप्पर का सहारा हूँ।।
टूटा हूँ मेरी किस्मत।
दरिया का किनारा हूँ।।
यूँ ही देखता नही कोई।
ख़ूबसूरत नजारा हूँ।।
तुझे धोखा हुआ होगा।
गिनती नहीं पहाड़ा हूँ।।
बेअम्नी इस दुनिया में।
‘अमन’ बनके हारा हूँ।।

3

मुझे जीने का मौका तो दिया होता।
फिर चाहे सारा लहु पी लिया होता।।
मेरी साफ़गोई की सजा मिली मुझे।
काश मैंने होंठों को सी लिया होता।।
इल्ज़ाम लगाके औक़ात दिखा दी।
मेरा हिस्सा भी तूने ले लिया होता।।
मुझसे पीने के लिये कहा तो होता।
अगर ज़हर था मैंने पी लिया होता।।
राम सा वनवास काट लेता ‘अमन’।
बाइज्ज़त घर से निकाल दिया होता।।

4

दुनिया को दहलीज़ बना लिया है।
हर चीज़ को नाचीज़ बना लिया है।।
हौसला देखलें अब देखने वाले।
आसमां को छत बना लिया है।।
गिरने का अब डर भी नही रहा।
धरती को बिछोना बना लिया है।।
मौत से भी अब डर नहीं लगता।
मौत को सहारा बना लिया है।।
चाहे तो चल साथ मेरे ‘अमन’।
दुश्मनों को हमराह बना लिया है।।

- अमन कुमार त्यागी

Thursday, 15 November 2012

हिलाल साहिब नहीं रहे


शख्सियत

हिलाल साहिब नहीं रहे

डा. वीरेन्द्र पुष्पक का 15 नवम्बर को करीब 7 बजे (रात्रि) फोन आया। वह सिर्फ यही कह पाये कि हिलाल साहिब नहीं रहे। इस एक वाक्य ने अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी। यह कहने को तो एक वाक्य ही था मगर एक युग को समेटे हुए। एक नहीं अनेक शायरों ने हिलाल का जलाल देखा है। हिलाल साहिब का भले ही विदा होते हुए नाम हिलाल ही रहा हो मगर वो पूरी जरह से जलाल थे। तन्जो मिज़ाह का यह शायर हिन्दुस्तान की सरहदों से बाहर पाकिस्तान, इराक, कुवैत, आस्ट्रेलिया आदि में भी अपने उसी जलाल के साथ जाना-पहचाना गया जिस जलाल के साथ हिन्दुस्तान में। हिलाल स्योहारवी को वर्ष 1989 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा मिर्जा गालिब सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं।

हिलाल साहिब के असमय चले जाने पर दुखी हो डा. वीरेन्द्र पुष्पक कहते हैं- वयोवृद्ध एवं अंतर्राष्ट्रीय शायर हिलाल स्योहारवी की नई पुस्तक ‘‘नुक्ता ए नजर’’ जो कि परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद से प्रकाशित हुई है, का विमोचन एवं जश्ने हिलाल का आयोजन करने का सपना अधूरा रह गया।



स्योहारा में जन्में हबीबुर्रहमान पुत्र फजल हक की शिक्षा स्योहारा और अलीगढ़ में सम्पन्न हुई। शायरी के क्षेत्र में आपकी पहचान हिलाल स्योहारवी के रूप में हुई। हिलाल का अर्थ है- नया चाँद। हिलाल साहिब की शायरी के जलाल (प्रताप, तेज़, अज़मत) ने उन्हें और भी ऊँचाइयों पर स्थापित कर दिया। उनके उस्ताद अब्दुल खालिक निहाल स्योहारवी को अपने इस शागिर्द पर यू ही नाज़ नहीं था।

हिलाल स्योहारवी ने 41 वर्षो तक अपर गैंगेज स्योहारा शुगर मिल में ईमानदारी के साथ नौकरी की। इसी दौरान आपको शायरी का चस्का लग गया। उस्ताद के रूप में निहाल साहिब मिले तो आप में निखार आ गया। आपके द्वारा रचित ग़ज़ल, नज़्म और कतआ अनेक संग्रहों फरेबे सहर, फरेबे नज़र, अंगूठा छाप, अगर बुरा न लगे (उर्दू) धुंधला सवेरा और नुक़ता ए नज़र (हिन्दी) में संग्रहित हैं।

हिलाल साहिब ने मुम्बई का भी रुख किया यहीं पर उनकी सुपरस्टार रहे दिलीप कुमार और जानी वाकर से दोस्ती हो गई।

हिलाल साहिब के नजदीकी डा. मनोज वर्मा  कहते हैं- स्योहारा वासियों के लिए उनकी पुस्तक का विमोचन ही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

हिलाल साहिब को श्रद्धांजलि देते हुए मशहूर शायर जनबा महेन्द्र अश्क कहते हैं-
                           जिन्दगी जिसपे नाज़ करती है।
                           उसको जाहो जलाल कहते हैं।।
                           और जिस पे है शायरी नाज़ा।
                           लोग उसको हिलाल कहते हैं।।
-अमन कुमार त्यागी
PARILEKH PRAKASHAN  NAJIBABAD Mob-09897742814

गुलाबों का बादशाह

कहानी

गुलाबों का बादशाह


-अमन कुमार त्यागी


आसपास के सभी लोग उसे गुलाबों के बाह के रूप में ही जानते थे। उसका असल नाम क्या है? अब तो स्वयं उसे भी स्मरण नहीं रहा। मुश्किल से तीन वर्ष का रहा होगा, जब उसके माँ-बाप ने उससे सदा के लिए विदा ले ली थी। इस भरी दुनिया में वह नितान्त अकेला था। उसकी उम्र लगभग पैंसठ वर्ष हो चुकी है। विवाह के अनेक प्रस्तावों के बावजूद उसने कुंवारा ही रहना उचित समझा। मन लगाने के लिए उसके पास बड़ा सा गुलाबों का बगीचा है। कहा जाता है कि जब उसके माता-पिता ने उससे विदा ली थी, तब वह इसी बगीचे में था। यह बगीचा उस वक्त उतना खूबसूरत नहीं था, जितना कि आज है। तब व्याधियां भी अधिक थीं और उसके माता-पिता इस बगीचे की देखभाल भी उचित प्रकार से नहीं कर सके थे। पड़ोसियों के जानवर इस बगीचे में आते। जहाँ अच्छा लगता मुँह मारते और जहाँ मन करता गोबर करते और फिर चले जाते। हद तो ये हो गयी कि बाद में एक दो सांडों ने इस सुन्दर बगीचे को अपना आसियाना ही बना लिया। गुलाबों के बादशाह के माता-पिता इन सांडों से मरते दम तक अपने बगीचे को आजाद नहीं करा सके। आज गुलाबों का बादशाह अपने बगीचे को साफ-सुथरा रखता है। क्या मजाल एक भी पड़ोसी जानवर उसके बगीचे में घुस आए। उसके बगीचे में आज तरह-तरह के गुलाब हैं, जो दूर तक अपनी खुशबू बिखेरते हैं। गुलाबों का बादशाह कहता है- "मैं अपने बगीचे में किसी को घुसने नहीं देता, और मेरे गुलाबों की खूशबु को कोई रोक नहीं पाता।"    

यह कहते हुए वह कभी-कभी गम्भीर भी जाता है। स्मृति में खोया वह कहता है- ‘‘मेरे माँ-बाप के जाने के बाद यहाँ बहुत लोगों में आपसी झगड़े हुए। कोई इस बगीचे में अपने घर का कूड़ा डालना चाहता था, तो कोई उपले पाथने के लिए पथवारा ही बनाना चाहता था। सब अपने-अपने तरीके से कब्जाने का प्रयास कर रहे थे।’’ बताते-बताते वह एकाएक मुस्करा उठता है। वह अपने आप से सवाल करता है -‘‘परन्तु हुआ क्या?’’ फिर अपने आप ही जवाब भी देता है- ‘‘बर्बाद हो गये सब। आपसी झगड़ों में कई मारे गये, जो बचे वो अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं।’’     

गुलाबों का यह बादशाह आपसे बातें करते-करते अचानक उठता है और जब वापिस आता है तो उसके हाथ में गुलाब की दो चार पंखुड़ियाँ और पत्तों के सिवा कुछ नहीं होता। आप उससे प्रश्न भी नहीं कर पाएंगे कि वह स्वयं ही उत्तर दे देता है- "बुरा नहीं मानिये साहब, मैं लापरवाह नहीं हूँ और न ही मुझे अपने बगीचे में किसी प्रकार की गन्दगी ही पसन्द है।"   


गुलाबों का यह बादशाह बड़ा ही विचित्र जीव है। वह गुलाबों की कटाई-छंटाई नहीं करता और एक पत्ते को भी जमीन पर नहीं गिरे रहने देता। पत्तों और पंखुड़ियों को वह एक गड्ढे में डालता जाता है। जिसमें ये पत्ते और पंखुड़ियाँ सड़कर खाद बन जाती हैं। वह बताता है- "बगीचे में जो पत्ते और पंखुड़ियां बेकार हो जाती हैं, मैं उनसे भी काम लेता हूँ।"   


गुलाबों के इस बादशाह की विचित्रता तो देखिए कि इसके शरीर का एक भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहाँ कोई निशान न हो। हर तरफ से कटा-फटा। अभी भी कई अंगो से खून टपक रहा है। वह धरती से कुछ मिट्टी उठाता है और खून निकलने वाली जगहों पर मलते हुए मुस्कुराता है। "क्या बताऊँ साहब?" जगह-जगह कांटे चुभ जाते हैं। बताते हुए वह गम्भीर हो जाता है और पूछता है- "आपको तो यहाँ के कांटे नहीं चुभे साहब?"  आप जवाब भी नहीं दे पाते कि उससे पहले ही वह बोल उठेगा- "आप यहाँ की खुशबू लीजिए जनाब, यहाँ के कांटे आपको नहीं चुभेंगे।"

      

गुलाब का फूल होता ही प्यारा है। उसे देखकर भला किसका जी नहीं ललचाता। बहुत से व्यक्ति होते हैं, जो गुलाब के ताजे फूल को अपने कोट में लगाने को अपनी शान समझते हैं। बहुत सी यौवनाएं होती हैं, जो गुलाब के फूल को अपने केशों में लगाकर प्रफुल्लित हो उठती हैं। बच्चों को नहीं पता गुलाब क्या होता है, मगर उन्हें भी गुलाब का फूल सबसे अधिक प्रिय होता है। आज कल तो हाल ये है कि हर कोई गुलाब सा दिखने के लिए ब्यूटिपार्लर के धंधे में चार चाँद लगा रहा है। यहाँ तक कि सारा संसार गुलाबी हो जाने को तत्पर है।  इस गुलाबी बगीचे को देखकर जो आनन्द आता है। वह अद्वितीय है। बाहरी लोग इस बगीचे की तुलना में अनेकों बगीचे लगा रहे हैं। यहाँ तक कि खूबसूरत रात को गुलाबी रात और खूबसूरत मौसम को गुलाबी मौसम भी कहा जाने लगा है। अंग्रेजों ने इसकी खूबसूरती को देखते हुए ‘पिंक’ शब्द दिया है। पिंक नाइट, पिंक कलर, पिंक वल्र्ड और न जाने क्या-क्या?   


गुलाबों के बादषाह के इसी बगीचे में विभिन्न प्रकार के गुलाब हैं। गुलाबों का बादशाह बातों-बातों में बताता है- ‘‘इस बगीचे का हर गुलाब आपको एक से बढ़कर एक लगेगा। मगर...।’’ कहते-कहते गुलाबों के बादशाह की जुबान लड़खड़ाने लगती है। वह चन्द पलों के बाद नियंत्रित हो जाता है और फिर किसी भयानक दर्द को छिपाते हुए मुस्कुराने का प्रयास करता हुआ कहता है- "ठीक है, अब आप जाइये, मुझे बहुत काम करने हैं।" 


मैं इस बगीचे में घूमकर गुलाबों को देखना चाहता हूँ। यह बात कहते ही वह जमकर खड़ा हो जाता है और दृढ़ता के साथ कहता है- "बस दूर से ही देखना, कोई मेरे गुलाबों को छूकर देखे, ये मैं सहन नहीं कर पाऊंगा।"  

      "जी अच्छा मैं दूर से ही देखूंगा।" सहमती के साथ ही वह भी अपनी सहमति दे देता है।    


अब उसके साथ उसके खूबसूरत बगीचे में घूम रहे हैं। वह जिस पथ पर चल रहा है उसे राजपथ कहता है। वह बताता है, यहाँ का हर पथ मेरे राजमहल तक जाता है। गुलाबों का बादशाह बगीचे के बीचो-बीच तक झोपड़ी में रहता है, जिसे वह अपना राजमहल कहता है।  


वह अपने गुलाबों की तारीफ करते हुए थकता नहीं। उसके इस बगीचे में सम्पूर्ण भारत में पाये जाने वाले गुलाब मौजूद हैं। अभी पिछले दिनों उसने एक गुलाब विदेश से भी मंगवाया है। इसके बारे में वह कहता है- ‘‘मेरा यह गुलाब इतना सोहणा है कि सभी के मन को मोह लेता है।’’ 

    

एक और गुलाब की ओर इशारा करते हुए वह बताता है- ‘‘यह गुलाब देखो, मोटा है मगर इसकी माया निराली है। जो भी इसे एक बार देख ले, वो इसे बार बार देखना पसंद करता है। इसी के बराबर में एक और नरम-मुलायमसा गुलाब दिख रहा है, मगर यह उतना मुलायम भी नहीं है, जितना कि देखने में लगता है। और उससे आगे वो पीछे वाला, देखो, उस गुलाब की सदा जय-जय होती है, और उसके बाये, वो सफेद वाला गुलाब बड़ा ही ममतामयी है।   


वह अपने गुलाबों की तारीफें करता जाता है और देखने वाला हैरत से देखता है। वह प्रसन्नचित्त हो कहता है-‘‘वह देख रहे हैं आप, काला गुलाब, मैं उसकी जड़ में प्रतिदिन मांड डालता हूँ। उसका वृक्ष बड़ा है। इतना बड़ा कि उसके नीचे दो-चार बालक भी आराम से खेल सकते हैं। और उसी के बराबर में वह लम्बा सा गुलाब, इसे मैं राजा कहता हूँ। यह किसी मोबाइल टावर की तरह लम्बा लगता है। राजा के पीछे वाला गुलाब बड़ा प्यारा है। यह बड़ा सुख देता है। इतना सुख जो रामराज में ही मिला हो सकता है।      


एकाएक गुलाबों का बादशाह पीछे मुड़ता है और एक पौधे की ओर इषारा करते हुए कहता है-‘‘यह गुलाब कमाल का है, कहा जाता है कि ये दिगदिगन्तर विजयी है।’’ बताते हुए वह अपनी झौंपड़ी की ओर बढ़ता है। जहाँ अनेकों छोटे-छोटे गुलाबों के पौधे उग रहे थे। जिन्हें देखकर गुलाबों का बादशाह गर्व के साथ कहता है-‘‘ये मेरे बगीचे का भविष्य हैं।’’   


बात करते हुए वह झौंपड़ी में घुस जाता है। बाहर से खूबसूरत लगने वाली झौंपड़ी अन्दर से बड़ी ही अस्तव्यस्त लग रही थी। सभी सामान दाये-बाये बिखरा पड़ा था। प्रतीत हो रहा था कि यहाँ कोई दंगा-फसाद हुआ है। गुलाबों का बादशाह मुस्कुराता हुआ बताता है-‘‘यही मेरा महल है, जहाँ बैठकर मैं अपने बगीचे को संवारने की योजनाएं बनाता हूँ।’’  

आप गुलाबों के बादशाह की बातें सुनकर आष्चर्य में पड़ सकते हैं। कभी वह आम आदमी नजर आता है और कभी बड़ा दाषर्निक।   


झौंपड़ी की विषेषता बताते-बताते गुलाबों के बादशाह के हलक से चीख निकल पड़ती है और वह वहीं जमीन पर बैठ जाता है। उसके दोनो हाथ अपने दाये पैर के तलवे की ओर बढ़ते हैं। उसके तलवे में एक कांटा चुभा था। कांटा बड़ा ही कसैला था। वह उस कांटे को निकालता है और एक तरफ फेंक देता है। उस स्थान पर कांटो का ढेर है। वह पुनः मुस्कुराने का प्रयत्न करते हुए कहता है-‘‘आप तो गुलाबों की खुशबू लीजिये साहब! कांटे इस झौंपड़ी को मुबारक।’’