Thursday, 12 January 2017

मौन/कहानी

अमन कुमार  त्‍यागी 

बूढ़ा मोहन अब स्वयं को परेशान अनुभव कर रहा था। अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना अब उसके लिए भारी पड़ रहा था। परिवार के अन्य कमाऊ सदस्य अपने मुखिया मोहन की अवहेलना करने लगे थे। मोहन की विधवा भाभी परिवार के सदस्यों की लगाम अपने हाथों में थामे थी। वह बड़ी चालाक थी। वह नहीं चाहती थी कि मोहन अथवा परिवार का कोई भी सदस्य उसकी अवहेलना करे। यूं भी कहा जा सकता है कि मोहन घर का मुखिया था, परन्तु घर के मामलों में सभी महत्वपूर्ण निर्णय सोमती देवी ही लेती थीं। मोहन को अपने लिये मौन के सिवा दूसरा कोई रास्ता नजर ही नहीं आता था।
दरअसल मोहन का बड़ा भाई सोहन सिंह बड़ा ही बलशाली और दबंग था। एक दुर्घटना में उसकी व मां इन्द्रो की मृत्यु हो गयी थी। तभी से घर-परिवार की जिम्मेदारी, मोहन और उसकी विधवा भाभी सोमती देवी दोनों ने संयुक्तरूप से सम्हाली थी। मोहन को अपना वह वचन आज भी याद है, जिसमें उसने अपनी भाभी सोमती देवी से कहा था- ‘आप बड़ी हैं, जैसा चाहेंगी हम करते जायेंगे।’ बस इसी एक बात का भरपूर लाभ सोमती देवी उठाना चाहती थीं। सोमती देवी ने अपने पुत्र रोलू को राजकुमार बनाने का सपना देख लिया था।
मोहन की माँ इन्द्रो का रूतबा भी मोहन की भाभी सोमती ने देखा था। उसे याद है एक बार उसकी सास इन्द्रो ने किस तरह पड़ौसी को पिटवाया था। पड़ोसी राज को लगता था कि इन्द्रो उसकी जमीन पर कब्जा करना चाहती है। बस फिर क्या था, राज ने एक दिन अपने कुछ आदमी बुलाये और सोमती की सास के घेर पर कब्जा करना शुरू कर दिया। सोमती की सास का घेर बहुत बड़ा था। उसकी चारदीवारी भी नहीं थी। सोमती की सास ने अपने परिवार के लड़ाकों के साथ मिलकर पड़ोसी राज पर हमला कर दिया और उसे खदेड़ दिया, मगर इसी बीच एक और घटना घटी। उसके दूसरे पड़ोसी नची ने भी उसके घेर की कुछ जमीन पर कब्जा कर लिया। नची उससे अधिक ताकतवर था। उसके पास पैसे और आदमियों की कोई कमी नहीं थी। यही कारण था कि सोमती की सास उसके अधिक मुँह नहीं लगी। अब सोमती का भी यही हाल है। वह नची को तो अनदेखा करती है मगर राज को धूल चटाने का भरपूर प्रयास करती है।
सोमती की खूब चलती थी। क्या मजाल कि उसके परिवार का कोई भी सदस्य उसके आगे सिर उठाकर बात कर सके। एक बार सोमती ने जो निर्णय ले लिया सो ले लिया। वह कहती थी- मुझे अच्छा नहीं लगता कोई मेरे सामने बोले, मैं जैसे कहती रहूं बस वैसे ही करते रहो।
सोमती किसी भी तरह अपने अकेले पुत्र रोलू को जिम्मेदार बनाना चाहती है। वह कहती- ‘देख लेना देवर जी! एक दिन हमारा रोलू ही हमारे परिवार की बागडोर संभालेगा।’ सोमती की इस मंशा को परिवार के सभी लोग जानते थे, मगर बोले कौन? वो सब मोहन की ओर देख रहे थे, जबकि मोहन भीगी बिल्ली बन सोमती के आगे दुम हिलाने के अतिरिक्त कुछ जानता ही नहीं था। 
बाहर वालों को लगता था कि मोहन का परिवार एकजुट है, और मजबूत है। परन्तु सच तो यह है कि उसके परिवार में अधिकारों और कत्र्तव्यों को लेकर फूट पड़ चुकी है। परिवार के लोग अब मोहन को महाभारत का भीष्म और सोमती को धृतराष्ट्र की संज्ञा देने लगे। दें भी क्यों न? सोमती भी तो अपने पुत्र रोलू को घर का मुखिया बनाने के लिए कोई भी उचित व अनुचित तरीका छोड़ नहीं रही थी। 
हालांकि परिवार के लोग अभी उग्र नहीं हुए थे। लगता भी नहीं कि वे कभी उग्र होंगे भी। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि कोई भी पारिवारिक सदस्य अपने आपको दांव पर नहीं लगाना चाहता था। किन्तु सभी कमाऊ सदस्यों ने अपनी-अपनी जेबें गर्म करना शुरू कर दी थी। चूंकि सभी जानते थे कि सोमती देवी अपने पुत्र रोलू को ही घर का मुखिया बना देंगी। ऐसे में उन सबको रोलू की ओर देखना पड़ेगा। सो सभी ने अपनी-अपनी तिजोरियां भरनी शुरू कर दी। परिणामस्वरूप अब आय के स्त्रोत वही रहने के बावजूद आय घटने लगी। 
सोमती देवी निराश हैं। वह कभी-कभी खीझ उठती हैं। कहती है-‘सब निकम्मे होते जा रहे हैं, कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं सम्हाल रहा है। लगता है अब रोलू को ही कुछ करना पड़ेगा।’ उन्हें लगता है कि कहीं रोलू के हाथों से सबकुछ निकल न जाये। वह रोलू को धनवान देखना चाहती हैं। वह समझती है कि विरासत पर सिर्फ और सिर्फ रोलू का ही हक है। परिवार के शेष लोग तो सिर्फ काम करने के लिए ही पैदा हुए हैं। 
एक बार मोहन ने कहा भी था-‘भाभी जी! आजकल आप परिवार के दूसरे बच्चों को अनदेखा कर रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि बाकी सभी रोलू से दूर होते चले जाएं।’ 
तभी सोमती देवी ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा था-‘रोलू सा कोई नहीं है, उसे अपने खानदान की जिम्मेदारी सम्हालनी है, उससे किसी दूसरे बच्चे की तुलना नहीं की जा सकती।’ 
एक-दो बार और भी मोहन ने अपनी विधवा भाभी को समझाना चाहा, मगर सोमती की आँखों पर तो जैसे पट्टी बंधी थी। वह किसी की कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं होती। मोहन भी मौन हो जाता।
इन परिस्थितियों का मूल कारण भी छोटे भाई, मोहन को ही मानने लगे थे। यही कारण है कि परिवार के दूसरे लोग गाहे-बगाहे सोमती देवी को मोहन के खिलाफ़ चढ़ाते और बदले में हमदर्दी बटोरते। या फिर कभी-कभी मोहन से भी भाभी की शिकायत करते, और मोहन के मौन से अपने सवालों का जवाब जानने का असफल प्रयास करते। 
एक बार सबसे छोटे भाई ने मोहन से कहा भी था-‘देख लेना भाई! हम भी मौन ही रहेंगे, किन्तु हमारे खानदान के लिये यह मौन ठीक नहीं रहेगा।’
इसका परिणाम यह हुआ कि अब गाँव के वो लोग भी मोहन और उसके परिवार के खिलाफ बोलने लगे, जो उनके आगे खड़े होने में भी हिचकिचाते थे। मोहन के खेतों में भी अब नुकसान होने लगा था। दोनो पड़ोसी राज और नची भी मिल गये थे। उसने अपने भाइयों और नौकरों से कहा, तो सबने सामने हां-हां कर दी मगर ध्यान देने को कोई तैयार नहीं था। 
अब तक सोमती देवी भी नुकसान से बिलबिला उठी थीं। उन्होंने परिवार के सदस्यों को एकत्रित किया और उन्हें उनकी जिम्मेदारी में लापरवाही के लिये डांटने लगी-‘तुम सब निकम्मे हो गये हो, कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ रहा है।’ 
सुनकर सभी मौन थे, कोई कुछ नहीं बोला था। सोमती देवी को उनका यह मौन कभी बहुत अच्छा लगता था, खुश होती थीं, कि उनके सामने कोई नहीं बोलता है, मगर आज यही मौन उन्हें काटने को दौड़ रहा है, वह बेचैन हैं कि कोई बोलता क्यों नहीं।
अमन कुमार त्‍यागी 

Monday, 8 December 2014

क्षमादान
तोल्सतोय

अनुवाद - प्रेमचंद

दिल्ली नगर में भागीरथ नाम का युवक सौदागर रहता था। वहाँ उसकी अपनी दो दुकानें और एक रहने का मकान था। वह सुंदर था। उसके बाल कोमल, चमकीले और घुँघराले थे। वह हँसोड़ और गाने का बड़ा प्रेमी था। युवावस्था में उसे मद्य पीने की बान पड़ गई थी। अधिक पी जाने पर कभी कभी हल्ला भी मचाया करता था, परंतु विवाह कर लेने पर मद्य पीना छोड़ दिया था।
गर्मी में एक समय वह कुंभ पर गंगा जाने को तैयार हो, अपने बच्चों और स्त्री से विदा माँगने आया।
स्त्री- प्राणनाथ, आज न जाइए, मैंने बुरा सपना देखा है।
भागीरथ- प्रिये, तुम्हें भय है कि मैं मेले में जाकर तुम्हें भूल जाऊँगा ?
स्त्री- यह तो मैं नहीं जानती कि मैं क्यों डरती हूँ, केवल इतना जानती हूँ कि मैंने बुरा स्वप्न देखा है। मैंने देखा है कि जब तुम घर लौटे हो तो तुम्हारे बाल श्वेत हो गए हैं।
भागीरथ- यह तो सगुन है। देख लेना मैं सारा माल बेच, मेले से तुम्हारे लिए अच्छी-अच्छी चीजें लाऊँगा।
यह कह गाड़ी पर बैठ, वह चल दिया। आधी दूर जाकर उसे एक सौदागर मिला, जिससे उसकी जान पहचान थी। वे दोनों रात को एक ही सराय में ठहरे। संध्या समय भोजन कर पास की कोठरियों में सो गए।
भागीरथ को सबेरे जाग उठने का अभ्यास था। उसने यह विचार करके कि ठंडे ठंडे राह चलना सुगम होगा, मुँह अँधेरे उठ, गाड़ी तैयार कराई और भटियारे के दाम चुका कर चलता बना। पच्चीस कोस जाने पर घोड़ों को आराम देने के लिए एक सराय में ठहरा और आँगन में बैठकर सितार बजाने लगा।
अचानक एक गाड़ी आई- पुलिस का एक कर्मचारी और दो सिपाही उतरे। कर्मचारी उसके समीप आ कर पूछने लगा कि तुम कौन हो और कहाँ से आए हो? वह सब कुछ बतला कर बोला कि आइए, भोजन कीजिए। परंतु कर्मचारी बारबार यही पूछता था कि तुम रात को कहाँ ठहरे थे? अकेले थे या कोई साथ था? तुमने साथी को आज सवेरे देखा या नहीं। तुम मुँह अँधेरे क्यों चले आए?
भागीरथ को अचंभा हुआ कि बात क्या है? यह प्रश्न क्यों पूछे जा रहे हैं? बोला- आप तो मुझसे इस भाँति पूछते हैं, जैसे मैं कोई चोर या डाकू हूँ। मैं तो गंगास्नान करने जा रहा हूँ। आपको मुझसे क्या मतलब है?
कर्मचारी- मैं इस प्रांत का पुलिस अफसर हूँ, और यह प्रश्न इसलिए करता हूँ कि जिस सौदागर के साथ तुम कल रात सराय में सोए थे, वह मार डाला गया। हम तुम्हारी तलाशी लेने आए हैं।
यह कह वह उसके असबाब की तलाशी लेने लगा। एकाएक थैले में से एक छुरा निकला, वह खून से भरा हुआ था। यह देखकर भागीरथ डर गया।
कर्मचारी- यह छुरा किसका है ? इस पर खून कहाँ से लगा ?
भागीरथ चुप रह गया, उसका कंठ रुक गया। हिचकता हुआ कहने लगा- मेरा नहीं है। मैं नहीं जानता।
कर्मचारी- आज सवेरे हमने देखा कि वह सौदागर गला कटे चारपाई पर पड़ा है। कोठरी अंदर से बंद थी, सिवाय तुम्हारे भीतर कोई न था। अब यह खून से भरा हुआ छुरा इस थैले में से निकला है। तुम्हारा मुख ही गवाही दे रहा है। बस, तुमने ही उसे मारा है। बतलाओ, किस तरह मारा और कितने रुपये चुराए हैं ?
भागीरथ ने सौगंध खाकर कहा- मैंने सौदागर को नहीं मारा। भोजन करने के पीछे फिर मैंने उसे नहीं देखा। मेरे पास अपने आठ हजार रुपये हैं। यह छुरा मेरा नहीं।
परंतु उसकी बातें उखड़ी हुई थीं, मुख पीला पड़ गया था और वह पापी की भाँति भय से काँप रहा था।
पुलिस अफसर ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि इसकी मुस्कें कसकर गाड़ी में डाल दो। जब सिपाहियों ने उसकी मुस्कें कसीं, तो वह रोने लगा। अफसर ने पास के थाने पर ले जाकर उसका रुपया पैसा छीन, उसे हवालात में दे दिया।
इसके बाद दिल्ली में उसके चाल-चलन की जाँच की गई। सब लोगों ने यही कहा कि पहले वह मद्य पीकर बकझक किया करता था, पर अब उसका आचार बहुत अच्छा है। अदालत में तहकीकात होने पर उसे रामपुर निवासी सौदागर का वध करने और बीस हजार रुपये चुरा लेने का अपराधी ठहराया गया।
भागीरथ की स्त्री को इस बात पर विश्वास न होता था। उसके बालक छोटे-छोटे थे। एक अभी दूध पीता था। वह सबको साथ लेकर पति के पास पहुँची। पहले तो कर्मचारियों ने उसे उससे मिलने की आज्ञा न दी, परंतु बहुत विनय करने पर आज्ञा मिल गई। और पहरे वाले उसे कैद घर में ले गए। ज्यों ही उसने अपने पति को बेड़ी पहने हुए चोरों और डाकुओं के बीच में बैठा देखा, वह बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ी। बहुत देर में सुध आई। वह बच्चों सहित पति के निकट बैठ गई और घर का हाल कह कर पूछने लगी कि यह क्या बात है ? भागीरथ ने सारा वृतांत कह सुनाया।
स्त्री- तो अब क्या हो सकता है ?
भागीरथ- हमें महाराज से विनय करनी चाहिए कि वह निरपराधी को जान से न मारें।
स्त्री- मैंने महाराज से विनय की थी, परंतु वह स्वीकार नहीं हुई।
भागीरथ ने निराश होकर सिर झुका लिया।
स्त्री- देखा, मेरा सपना कैसा सच निकला! तुम्हें याद है न, मैंने तुमको उस दिन मेले जाने से रोका था। तुम्हें उस दिन न चलना चाहिए था, लेकिन मेरी बात न मानी। सच सच बताओ, तुमने तो उस सौदागर को नहीं मारा न?
भागीरथ- क्या तुम्हें भी मेरे ऊपर संदेह है?
यह कह कर वह मुँह ढाँप रोने लगा। इतने में सिपाही ने आकर स्त्री को वहाँ से हटा दिया और भागीरथ सदैव के लिए अपने परिवार से विदा हो गया।
घर वालों के चले जाने पर जब भागीरथ ने यह विचारा कि मेरी स्त्री भी मुझे अपराधी समझती है तो मन में कहा- बस, मालूम हो गया, परमात्मा के बिना और कोई नहीं जान सकता कि मैं पापी हूँ या नहीं। उसी से दया की आशा रखनी चाहिए। फिर उसने छूटने का कोई यत्न नहीं किया। चारों ओर से निराश हो कर ईश्वर के ही भरोसे बैठा रहा।
भागीरथ को पहले तो कोड़े मारे गए। जब घाव भर गए तो उसे लोहग बंदीखाने में भेज दिया गया।
वह छब्बीस वर्ष बंदीखाने में पड़ा रहा। उसके बाल पककर सन के से हो गए, कमर मोटी हो गई, देह घुल गई, सदैव उदास रहता। न कभी हँसता, न बोलता, परंतु भगवान का भजन नित्य किया करता था।
वहाँ उसने दरी बुनने का काम सीखकर कुछ रुपया जमा किया और भक्तमाल मोल ले ली। दिन भर काम करने के बाद साँझ को जब तक सूरज का प्रकाश रहता, वह पुस्तक का पाठ करता और इतवार के दिन बंदीखाने के निकट वाले मंदिर में जाकर पूजापाठ भी कर लेता था। जेल के कर्मचारी उसे सुशील जानकर उसका मान करते थे। कैदी लोग उसे बू़्ढ़े बाबा अथवा महात्मा कहकर पुकारा करते थे। कैदियों को जब कभी कोई अर्जी भेजनी होती, तो वे उसे अपना मुखिया बनाते और अपने झगड़े भी उसी से चुकाया करते।
उसे घर का कोई समाचार न मिलता था। उसे यह भी न मालूम था कि स्त्री-बालक जीते हैं या मर गए।
एक दिन कुछ नए कैदी आए। संध्या समय पुराने कैदी उनके पास आकर पूछने लगे कि भाई, तुम कहाँ से आए हो और तुमने क्या क्या अपराध किए हैं ? भागीरथ उदास बैठा सुनता रहा। नए कैदियों में एक साठ वर्ष का हट्टा-कट्टा आदमी, जिसके दाढ़ी-बाल खूब छंटे हुए थे, अपनी रामकहानी यों सुना रहा था !
'भाइयो, मेरे मित्र का घोड़ा एक पेड़ से बंधा हुआ था। मुझे घर जाने की जल्दी पड़ी हुई थी। मैं उस घोड़े पर सवार होकर चला गया। वहाँ जाकर मैंने घोड़ा छोड़ दिया। मित्र कहीं चला गया था। पुलिस वालों ने चोर ठहराकर मुझे पकड़ लिया। यद्यपि कोई यह नहीं बतला सका कि मैंने किसका घोड़ा चुराया और कहाँ से, फिर भी चोरी के अपराध में मुझे यहाँ भेज दिया है। इससे पहले एक बार मैंने ऐसा अपराध किया था कि मैं लोहग में भेजे जाने लायक था, परंतु मुझे उस समय कोई नहीं पकड़ सका। अब बिना अपराध ही यहाँ भेज दिया गया हूँ।
एक कैदी- तुम कहाँ से आए हो?
नया कैदी- दिल्ली से। मेरा नाम बलदेव सिंह है।
भागीरथ- भला बलदेव सिंह, तुम्हें भागीरथ के घर वालों का कुछ हाल मालूम है, जीते हैं कि मर गए?
बलदेव- जानना क्या? मैं उन्हें भलीभाँति जानता हूँ। अच्छे मालदार हैं। हाँ उनका पिता यहीं कहीं कैद है। मेरे ही जैसा अपराध उनका भी था। बू़ढ़े बाबा, तुम यहाँ कैसे आए?
भगीरथ अपनी विपत्ति-कथा न कही। केवल हाय कहकर बोला- मैं अपने पापों के कारण छब्बीस वर्ष से यहाँ पड़ा सड़ रहा हूँ।
बलदेव- क्या पाप, मैं भी सुनूं?
भागीरथ- भाई, जाने दो, पापों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।
वह और कुछ न कहना चाहता था, परंतु दूसरे कैदियों ने बलदेव को सारा हाल कह सुनाया कि वह एक सौदागर का वध करने के अपराध में यहाँ कैद है। बलदेव ने यह हाल सुना तो भागीरथ को ध्यान से देखने लगा। घुटने पर हाथ मारकर बोला- वाह वाह, बड़ा अचरज है! लेकिन दादा, तुम तो बिल्कुल बूढ़े हो गए।
दूसरे कैदी बलदेव से पूछने लगे कि तुम भागीरथ को देखकर चकित क्यों हुए, तुमने क्या पहले कहीं उसे देखा है? परंतु बलदेव ने उत्तर नहीं दिया।
भागीरथ के चित्त में यह संशय उत्पन्न हुआ कि शायद बलदेव रामपुरी सौदागर के असली मारने वाले को जानता है। बोला- बलदेव सिंह, क्या तुमने यह बात सुनी है और मुझे भी पहले कहीं देखा है।
बलदेव- वह बातें तो सारे संसार में फैल रही हैं। मैं किस तरह न सुनता; बहुत दिन बीत गए, मुझे कुछ याद नहीं रहा।
भागीरथ- तुम्हें मालूम है कि उस सौदागर को किसने मारा था?
बलदेव- (हँसकर) जिसके थैले में छुरा निकला, वही उसका मारने वाला। यदि किसी ने थैले में छुरा छिपा भी दिया हो, तो जब तक कोई पकड़ा न जाए, उसे चोर कौन कह सकता है? थैला तुम्हारे सिरहाने धरा था। यदि कोई दूसरा पास आकर छुरा थैले में छिपाता तो तुम अवश्य जाग उठते।
यह बातें सुनकर भागीरथ को निश्चय हो गया कि सौदागर को इसी ने मारा है। वह उठकर वहाँ से चल दिया, पर सारी रात जागता रहा। दुःख से उसका चित्त व्याकुल हो रहा था। उसे अनेक प्रकार की बातें याद आने लगीं। पहले स्त्री की उस समय की सूरत दिखाई दी जब वह उसे मेले जाने को मना कर रही थी। सामने ऐसा जान पड़ा कि वह खड़ी है। उसकी बोली और हँसी तक सुनाई दी। फिर बालक दिखाई पड़े, फिर युवावस्था की याद आई, कितना प्रसन्नचित्त था, कैसा आनंद से द्वार पर बैठा सितार बजाया करता था। फिर वह सराय दिखाई दी, जहाँ वह पकड़ा गया था। तब वह जगह सामने आई, जहाँ उस पर कोड़े लगे थे। फिर बेड़ी और बंदीखाना, फिर बु़ढ़ापा और छब्बीस वर्ष का दुःख। यह सब बातें उसकी आँखों में फिरने लगीं। वह इतना दुःखी हुआ कि जी में आया कि अभी प्राण दे दूँ।
'हाय, इस बलदेव चंडाल ने यह क्या किया! मैं तो अपना सर्वनाश करके भी इससे बदला अवश्य लूँगा।'
सारी रात भजन करने पर भी उसे शांति नहीं हुई। दिन में उसने बलदेव को देखा तक नहीं। पंद्रह दिन बीत गए, भागीरथ की यह दशा थी कि न रात को नींद, न दिन को चैन। क्रोधाग्नि में जल रहा था।
एक रात वह जेलखाने में टहल रहा था कि उसने कैदियों के सोने के चबूतरे के नीचे से मिट्टी गिरते देखी। वह वहीं ठहर गया कि देखूँ मिट्टी कहाँ से आ रही है। सहसा बलदेव चबूतरे के नीचे से निकल आया और भय से काँपने लगा। भागीरथ आँखें मूँदकर आगे जाना चाहता था कि बलदेव ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- देखो, मैंने जूतों में मिट्टी भर के बाहर फेंककर यह सुरंग लगाई है, चुप रहना। मैं तुमको यहाँ से भगा देता हूँ। यदि शोर करोगे तो जेल के अफसर मुझे जान से मार डालेंगे, परंतु याद रखो कि तुम्हें मारकर मरुँगा, यों नहीं मरता।
भागीरथ अपने शत्रु को देखकर क्रोध से काँप उठा और हाथ छुड़ाकर बोला- मुझे भागने की इच्छा नहीं, और मुझे मारे तो तुम्हें छब्बीस वर्ष हो चुके। रही यह हाल प्रकट करने की बात, जैसी परमात्मा की आज्ञा होगी, वैसा होगा।
अगले दिन जब कैदी बाहर काम करने गए तो पहरे वालों ने सुरंग की मिट्टी बाहर पड़ी देख ली। खोज लगाने पर सुरंग का पता चल गया। हाकिम सब कैदियों से पूछने लगे। किसी ने न बतलाया, क्योंकि वे जानते थे कि यदि बतला दिया तो बलदेव मारा जाएगा। अफसर भागीरथ को सत्यवादी जानते थे, उससे पूछने लगे- बूढ़े बाबा, तुम सच्चे आदमी हो; सच बताओ कि यह सुरंग किसने लगाई है?
बलदेव पास ही ऐसे खड़ा था कि कुछ जानता ही नहीं। भागीरथ के होंठ और हाथ काँप रहे थे। चुपचाप विचार करने लगा कि जिसने मेरा सारा जीवन नाश कर दिया, उसे क्यों छिपाऊँ? दुःख का बदला दुःख उसे अवश्य भोगना चाहिए, परंतु बतला देने पर फिर वह बच नहीं सकता। शायद यह सब मेरा भरम मात्र हो, सौदागर को किसी और ने ही मारा हो। यदि इसने ही मारा तो इसे मरवा देने से मुझे क्या लाभ होगा?
अफसर- बाबा, चुप क्यों हो गए? बतलाते क्यों नहीं?
भागीरथ- मैं कुछ नहीं बतला सकता, आप जो चाहें सो करें।
हाकिम ने बार-बार पूछा, परंतु भागीरथ ने कुछ भी नहीं बतलाया। बात टल गई।
उसी रात भागीरथ जब अपनी कोठरी में लेटा हुआ था, बलदेव चुपके से भीतर आकर बैठ गया। भागीरथ ने देखा और कहा- बलदेव सिंह, अब और क्या चाहते हो? यहाँ तुम क्यों आए?
बलदेव चुप रहा।
भागीरथ- तुम क्या चाहते हो? यहाँ से चले जाओ, नहीं तो मैं पहरे वाले को बुला लूँगा।
बलदेव- (पाँव पर पड़कर) भागीरथ, मुझे क्षमा करो, क्षमा करो।
भागीरथ- क्यों?
बलदेव- मैंने ही उस सौदागर को मारकर छुरा तुम्हारे थैले में छिपाया था। मैं तुम्हें भी मारना चाहता था। परंतु बाहर से आहट हो गई, मैं छुरा थैले में रखकर भाग निकला।
भागीरथ चुप हो गया, कुछ नहीं बोला।
बलदेव- भाई भागीरथ, भगवान के वास्ते मुझ पर दया करो, मुझे क्षमा करो। मैं कल अपना अपराध अंगीकार कर लूँगा। तुम छूटकर अपने घर चले जाओगे।
भागीरथ- बातें बनाना सहज है। छब्बीस वर्ष के इस दुःख को देखो, अब मैं कहाँ जा सकता हूँ? स्त्री मर गई, लड़के भूल गए, अब तो मेरा कहीं ठिकाना नहीं है।
बलदेव धरती से माथा फोड़, रो-रो कर कहने लगा- मुझे कोड़े लगने पर भी इतना कष्ट नहीं हुआ था, जो अब तुम्हें देखकर हो रहा है। तुमने दया करके सुरंग की बात नहीं बतलाई। क्षमा करो, क्षमा करो, मैं अत्यंत दुःखी हो रहा हूँ!
यह कह बलदेव धाड़ मारकर रोने लगा। भागीरथ के नेत्रों से भी जल की धारा बह निकली। बोला- पूर्ण परमात्मा, तुम पर दया करें, कौन जाने कि मैं अच्छा हूँ अथवा तुम अच्छे हो। मैंने तुम्हें क्षमा किया।
अगले दिन बलदेव सिंह ने स्वयं कर्मचारियों के पास जाकर सारा हाल सुनाकर अपना अपराध मान लिया, परंतु भागीरथ को छोड़ देने का जब परवाना आया, तो उसका देहांत हो चुका था।
एक चिनगारी घर को जला देती है
 
तोल्सतोय

अनुवाद - प्रेमचंद


एक समय एक गांव में रहीम खां नामक एक मालदार किसान रहता था। उसके तीन पुत्र थे, सब युवक और काम करने में चतुर थे। सबसे बड़ा ब्याहा हुआ था, मंझला ब्याहने को था, छोटा क्वांरा था। रहीम की स्त्री और बहू चतुर और सुशील थीं। घर के सभी पराणी अपना-अपना काम करते थे, केवल रहीम का बूढ़ा बाप दमे के रोग से पीड़ित होने के कारण कुछ कामकाज न करता था। सात बरसों से वह केवल खाट पर पड़ा रहता था। रहीम के पास तीन बैल, एक गाय, एक बछड़ा, पंद्रह भेड़ें थीं। स्त्रियां खेती के काम में सहायता करती थीं। अनाज बहुत पैदा हो जाता था। रहीम और उसके बाल-बच्चे बड़े आराम से रहते; अगर पड़ोसी करीम के लंगड़े पुत्र कादिर के साथ इनका एक ऐसा झगड़ा न छिड़ गया होता जिससे सुखचैन जाता रहा था।
जब तक बूढ़ा करीम जीता रहा और रहीम का पिता घर का प्रबंध करता रहा, कोई झगड़ा नहीं हुआ। वह बड़े प्रेमभाव से, जैसा कि पड़ोसियों में होना चाहिए, एक-दूसरे की सहायता करते रहे। लड़कों का घरों को संभालना था कि सबकुछ बदल गया।
अब सुनिए कि झगड़ा किस बात पर छिड़ा। रहीम की बहू ने कुछ मुर्गियां पाल रखी थीं। एक मुर्गी नित्य पशुशाला में जाकर अंडा दिया करती थी। बहू शाम को वहां जाती और अंडा उठा लाती। एक दिन दैव गति से वह मुर्गी बालकों से डरकर पड़ोसी के आंगन में चली गयी और वहां अंडा दे आई। शाम को बहू ने पशुशाला में जाकर देखा तो अंडा वहां न था। सास से पूछा, उसे क्या मालूम था। देवर बोला कि मुर्गी पड़ोसिन के आंगन में कुड़कुड़ा रही थी, शायद वहां अंडा दे आयी हो।
बहू वहां पहुंचकर अंडा खोजने लगी। भीतर से कादिर की माता निकलकर पूछने लगी - बहू, क्या है?
बहू - मेरी मुर्गी तुम्हारे आंगन में अंडा दे गई है, उसे खोजती हूं। तुमने देखा हो तो बता दो।
कादिर की मां ने कहा - मैंने नहीं देखा। क्या हमारी मुर्गियां अंडे नहीं देतीं कि हम तुम्हारे अंडे बटोरती फिरेंगी। दूसरों के घर जाकर अंडे खोजने की हमारी आदत नहीं।
यह सुनकर बहू आग हो गई, लगी बकने। कादिर की मां कुछ कम न थी, एकएक बात के सौसौ उत्तर दिये। रहीम की स्त्री पानी लाने बाहर निकली थी। गालीगलौच का शोर सुनकर वह भी आ पहुंची। उधर से कादिर की स्त्री भी दौड़ पड़ी। अब सबकी-सब इकट्ठी होकर लगीं गालियां बकने और लड़ने। कादिर खेत से आ रहा था, वह भी आकर मिल गया। इतने में रहीम भी आ पहुंचा। पूरा महाभारत हो गया। अब दोनों गुंथ गए। रहीम ने कादिर की दाढ़ी के बाल उखाड़ डाले। गांव वालों ने आकर बड़ी मुश्किल से उन्हें छुड़ाया। पर कादिर ने अपनी दाढ़ी के बाल उखाड़ लिये और हाकिम परगना के इजलास में जाकर कहा - मैंने दाढ़ी इसलिए नहीं रखी थी जो यों उखाड़ी जाये। रहीम से हरजाना लिया जाए। पर रहीम के बू़ढ़े पिता ने उसे समझाया - बेटा, ऐसी तुच्छ बात पर लड़ाई करना मूर्खता नहीं तो क्या है। जरा विचार तो करो, सारा बखेड़ा सिर्फ एक अंडे से फैला है। कौन जाने शायद किसी बालक ने उठा लिया हो, और फिर अंडा था कितने का? परमात्मा सबका पालनपोषण करता है। पड़ोसी यदि गाली दे भी दे, तो क्या गाली के बदले गाली देकर अपनी आत्मा को मलिन करना उचित है? कभी नहीं, खैर! अब तो जो होना था, वह हो ही गया, उसे मिटाना उचित है, बढ़ाना ठीक नहीं। क्रोध पाप का मूल है। याद रखो, लड़ाई बढ़ाने से तुम्हारी ही हानि होगी।
परन्तु बू़ढ़े की बात पर किसी ने कान न धरा। रहीम कहने लगा कि कादिर को धन का घमंड है, मैं क्या किसी का दिया खाता हूं? बड़े घर न भेज दिया तो कहना। उसने भी नालिश ठोंक दी।
यह मुकदमा चल ही रहा था कि कादिर की गाड़ी की एक कील खो गई। उसके परिवार वालों ने रहीम के बड़े लड़के पर चोरी की नालिश कर दी।
अब कोई दिन ऐसा न जाता था कि लड़ाई न हो। बड़ों को देखकर बालक भी आपस में लड़ने लगे। जब कभी वस्त्र धोने के लिए स्त्रियां नदी पर इकट्ठी होती थीं, तो सिवाय लड़ाई के कुछ काम न करती थीं।
पहलेपहल तो गालीगलौज पर ही बस हो जाती थी, पर अब वे एकदूसरे का माल चुराने लगे। जीना दुर्लभ हो गया। न्याय चुकातेचुकाते वहां के कर्मचारी थक गए। कभी कादिर रहीम को कैद करा देता, कभी वह उसको बंदीखाने भिजवा देता। कुत्तों की भांति जितना ही लड़ते थे, उतना ही क्रोध बढ़ता था। छह वर्ष तक यही हाल रहा। बू़ढ़े ने बहुतेरा सिर पटका कि 'लड़को, क्या करते हो? बदला लेना छोड़ दो, बैर भाव त्यागकर अपना काम करो। दूसरों को कष्ट देने से तुम्हारी ही हानि होगी।' परंतु किसी के कान पर जूं तक न रेंगती थी।
सातवें वर्ष गांव में किसी के घर विवाह था। स्त्रीपुरुष जमा थे। बातें करते-करते रहीम की बहू ने कादिर पर घोड़ा चुराने का दोष लगाया। वह आग हो गया, उठकर बहू को ऐसा मुक्का मारा कि वह सात दिन चारपाई पर पड़ी रही। वह उस समय गर्भवती थी। रहीम बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब काम बन गया। गर्भवती स्त्री को मारने के अपराध में इसे बंदीखाने न भिजवाया तो मेरा नाम रहीम ही नहीं। झट जाकर नालिश कर दी। तहकीकात होने पर मालूम हुआ कि बहू को कोई बड़ी चोट नहीं आई, मुकदमा खारिज हो गया। रहीम कब चुप रहने वाला था। ऊपर की कचहरी में गया और मुंशी को घूस देकर कादिर को बीस कोड़े मारने का हुक्म लिखवा दिया।
उस समय कादिर कचहरी से बाहर खड़ा था, हुक्म सुनते ही बोला - कोड़ों से मेरी पीठ तो जलेगी ही, परन्तु रहीम को भी भस्म किए बिना न छोड़ूँगा।
रहीम तुरन्त अदालत में गया और बोला - हुजूर, कादिर मेरा घर जलाने की धमकी देता है। कई आदमी गवाह हैं।
हाकिम ने कादिर को बुलाकर पूछा कि क्या बात है।
कादिर - सब झूठ, मैंने कोई धमकी नहीं दी। आप हाकिम हैं। जो चाहें सो करें, पर क्या न्याय इसी को कहते हैं कि सच्चा मारा जाए और झूठा चैन करे?
कादिर की सूरत देखकर हाकिम को निश्चय हो गया कि वह अवश्य रहीम को कोई न कोई कष्ट देगा। उसने कादिर को समझाते हुए कहा - देखो भाई, बुद्धि से काम लो। भला कादिर, गर्भवती स्त्री को मारना क्या ठीक था? यह तो ईश्वर की बड़ी कृपा हुई कि चोट नहीं आई, नहीं तो क्या जाने, क्या हो जाता। तुम विनय करके रहीम से अपना अपराध क्षमा करा लो, मैं हुक्म बदल डालूंगा।
मुंशी - दफा एक सौ सत्तरह के अनुसार हुक्म नहीं बदला जा सकता।
हाकिम - चुप रहो। परमात्मा को शांति प्रिय है, उसकी आज्ञा पालन करना सबका मुख्य धर्म है।
कादिर बोला - हुजूर, मेरी अवस्था अब पचास वर्ष की है। मेरे एक ब्याहा हुआ पुत्र भी है। आज तक मैंने कभी कोड़े नहीं खाए। मैं और उससे क्षमा? कभी नहीं मांग सकता। वह भी मुझे याद करेगा।
यह कहकर कादिर बाहर चला गया।
कचहरी गांव से सात मील पर थी। रहीम को घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो गया। उस समय घर में कोई न था। सब बाहर गए हुए थे। रहीम भीतर जाकर बैठ गया और विचार करने लगा। कोड़े लगने का हुक्म सुनकर कादिर का मुख कैसा उतर गया था! बेचारा दीवार की ओर मुंह करके रोने लगा था। हम और वह कितने दिन तक एक साथ खेले हैं, मुझे उस पर इतना क्रोध न करना चाहिए था। यदि मुझे कोड़े मारने का हुक्म सुनाया जाता, तो मेरी क्या दशा होती।
इस पर उसे कादिर पर दया आई। इतने में बू़ढ़े पिता ने आकर पूछा - कादिर को क्या दंड मिला?
रहीम - बीस कोड़े।
बूढ़ा - बुरा हुआ। बेटा, तुम अच्छा नहीं करते। इन बातों में कादिर की उतनी ही हानि होगी जितनी तुम्हारी। भला, मैं यह पूछता हूं कि कादिर पर कोड़े पड़ने से तुम्हें क्या लाभ होगा?
रहीम - वह फिर ऐसा काम नहीं करेगा।
बूढ़ा - क्या नहीं करेगा, उसने तुमसे बढ़कर कौन-सा बुरा काम किया है?
रहीम - वाह वाह, आप विचार तो करें कि उसने मुझे कितना कष्ट दिया है। स्त्री मरने से बची, अब घर जलाने की धमकी देता है, तो क्या मैं उसका जस गाऊं?
बूढ़ा - (आह भरकर) बेटा, मैं घर में पड़ा रहता हूं और तुम सर्वत्र घूमते हो, इसलिए तुम मुझे मूर्ख समझते हो। लेकिन द्रोह ने तुम्हें अंधा बना रखा है। दूसरों के दोष तुम्हारे नेत्रों के सामने हैं, अपने दोष पीठ पीछे हैं। भला, मैं पूछता हूं कि कादिर ने क्या किया! एक के करने से भी कभी लड़ाई हुआ करती है? कभी नहीं, दो बिना लड़ाई नहीं हो सकती। यदि तुम शान्त स्वभाव के होते, लड़ाई कैसे होती? भला जवाब तो दो, उसकी दाढ़ी के बाल किसने उखाड़े! उसका भूसा किसने चुराया? उसे अदालत में किसने घसीटा? तिस पर सारे दोष कादिर के माथे ही थोप रहे हो! तुम आप बुरे हो, बस यही सारे झगड़े की जड़ है। क्या मैंने तुम्हें यही शिक्षा दी है? क्या तुम नहीं जानते कि मैं और कादिर का पिता किस प्रेमभाव से रहते थे। यदि किसी के घर में अन्न चुक जाता था, तो एक-दूसरे से उधार लेकर काम चलता था; यदि कोई किसी और काम में लगा होता था, तो दूसरा उसके पशु चरा लाता था। एक को किसी वस्तु की जरूरत होती थी, तो दूसरा तुरन्त दे देता था। न कोई लड़ाई थी न झगड़ा, प्रेमप्रीतिपूर्वक जीवन व्यतीत करता था। अब? अब तो तुमने महाभारत बना रखा है, क्या इसी का नाम जीवन है? हाय! हाय! यह तुम क्या पाप कर्म कर रहे हो? तुम घर के स्वामी हो, यमराज के सामने तुम्हें उत्तर देना होगा। बालकों और स्त्रियों को तुम क्या शिक्षा दे रहे हो, गाली बकना और ताने देना! कल तारावती पड़ोसिन धनदेवी को गालियां दे रही थी। उसकी माता पास बैठी सुन रही थी। क्या यही भलमनसी है? क्या गाली का बदला गाली होना चाहिए? नहीं बेटा, नहीं, महापुरुषों का वचन है कि कोई तुम्हें गाली दे तो सह लो, वह स्वयं पछताएगा। यदि कोई तुम्हारे गाल पर एक चपत मारे, तो दूसरा गाल उसके सामने कर दो, वह लज्जित और नम्र होकर तुम्हारा भक्त हो जाएगा। अभिमान ही सब दुःख का कारण है - तुम चुप क्यों हो गए! क्या मैं झूठ कहता हूं?
रहीम चुप रह गया, कुछ नहीं बोला।
बूढ़ा - महात्माओं का वाक्य क्या असत्य है, कभी नहीं। उसका एक-एक अक्षर पत्थर की लकीर है। अच्छा, अब तुम अपने इस जीवन पर विचार करो। जब से यह महाभारत आरम्भ हुआ है, तुम सुखी हो अथवा दुःखी! जरा हिसाब तो लगाओ कि इन मुकदमों, वकीलों और जाने-आने में कितना रुपया खर्च हो चुका है। देखो, तुम्हारे पुत्र कैसे सुन्दर और बलवान हैं, लेकिन तुम्हारी आमदनी घटती जाती है। क्यों? तुम्हारी मूर्खता से। तुम्हें चाहिए कि लड़कों सहित खेती का काम करो। पर तुम पर तो लड़ाई का भूत सवार है, वह चैन लेने नहीं देता। पिछले साल जई क्यों नहीं उगी, इसलिए कि समय पर नहीं बोई गई। मुकदमे चलाओ कि जई बोओ। बेटा, अपना काम करो, खेतीबारी को सम्हालो। यदि कोई कष्ट दे तो उसे क्षमा करो, परमात्मा इसी से प्रसन्न रहता है। ऐसा करने पर तुम्हारा अंतःकरण शुद्ध होकर तुम्हें आनन्द प्राप्त होगा।
रहीम कुछ नहीं बोला।
बूढ़ा - बेटा, अपने बू़ढ़े, मूर्ख पिता का कहना मानो। जाओ, कचहरी में जाकर आपस में राजीनामा कर लो। कल शबेरात है, कादिर के घर जाकर नम्रतापूर्वक उसे नेवता दो और घर वालों को भी यही शिक्षा दो कि बैर छोड़कर आपस में प्रेम बढ़ाएँ।
पिता की बातें सुनकर रहीम के मन में विचार हुआ कि पिताजी सच कहते हैं। इस लड़ाई-झगड़े से हम मिट्टी में मिले जाते हैं। लेकिन इस महाभारत को किस प्रकार समाप्त करूं? बूढ़ा उसके मन की बात जानकर बोला - बेटा, मैं तुम्हारे मन की बात जान गया। लज्जा त्याग जाकर कादिर से मित्रता कर लो। फैलने से पहले ही चिनगारी को बुझा देना उचित है, फैल जाने पर फिर कुछ नहीं बनता।
बूढ़ा कुछ और कहना चाहता था कि स्त्रियां कोलाहल करती हुई भीतर आ गईं, उन्होंने कादिर के दंड का हाल सुन लिया था। हाल में पड़ोसिन से लड़ाई करके आई थीं, आकर कहने लगीं कि कादिर यह भय दिखाता है कि मैंने घूस देकर हाकिम को अपनी ओर फेर लिया है, रहीम का सारा हाल लिखकर महाराज की सेवा में भेजने के लिए विनयपत्र तैयार किया है। देखो, क्या मजा चखाता हूं। आधी जायदाद न छीन ली तो बात ही क्या है? यह सुनना था कि रहीम के चित्त में फिर आग दहक उठी।
आषाढ़ी बोने की ऋतु थी। करने को काम बहुत था। रहीम भुसौल में गया और पशुओं को भूसा डालकर कुछ काम करने लगा। इस समय वह पिता की बातें और कादिर के साथ लड़ाई सब कुछ भूला हुआ था। रात को घर में आकर आराम करना ही चाहता था कि पास से शब्द सुनाई दिया - वह दुष्ट वध करने ही योग्य है, जीकर क्या बनाएगा। इन शब्दों ने रहीम को पागल बना दिया। वह चुपचाप खड़ा कादिर को गालियां सुनाता रहा। जब वह चुप हो गया, तो वह घर में चला गया।
भीतर आकर देखा कि बहू बैठी ताक रही है, स्त्री भोजन बना रही है, बड़ा लड़का दूध गर्म कर रहा है, मंझला झाड़ू लगा रहा है, छोटा भैंस चराने बाहर जाने को तैयार है। सुख की यह सब सामग्री थी, परन्तु पड़ोसी के साथ लड़ाई का दुःख सहा न जाता था।
वह जला-भुना भीतर आया। उसके कान में पड़ोसी के शब्द गूंज रहे थे, उसने सबसे लड़ना आरम्भ किया। इतने में छोटा लड़का भैंस चराने बाहर जाने लगा। रहीम भी उसके साथ बाहर चला आया। लड़का तो चल दिया, वह अकेला रह गया। रहीम मन में सोचने लगा - कादिर बड़ा दुष्ट है, हवा चल रही है, ऐसा न हो पीछे से आकर मकान में आग लगाकर भाग जाए। क्या अच्छा हो कि जब वह आग लगाने आए, तब उसे मैं पकड़ लूं। बस फिर कभी नहीं बच सकता, अवश्य उसे बन्दीखाने जाना पड़े।
यह विचार करके वह गली में पहुंच गया। सामने उसे कोई चीज़ हिलती दिखाई दी। पहले तो वह समझा कि कादिर है, पर वहां कुछ न था - चारों ओर सन्नाटा था।
थोड़ी दूर आगे जाकर देखता क्या है कि पशुशाला के पास एक मनुष्य जलता हुआ फूस का पूला हाथ में लिए खड़ा है। ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि कादिर है। फिर क्या था, जोर से दौड़ा कि उसे जाकर पकड़ ले।
रहीम अभी वहां पहुंचने न पाया था कि छप्पर में आग लगी, उजाला होने पर कादिर प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा। रहीम बाज की तरह झपटा, लेकिन कादिर उसकी आहट पाकर चम्पत हो गया।
रहीम उसके पीछे दौड़ा। उसके कुरते का पल्ला हाथ में आया ही था कि वह छुड़ाकर फिर भागा। रहीम धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़ा, उठकर फिर दौड़ा। इतने में कादिर अपने घर पहुंच गया। रहीम वहां जाकर उसे पकड़ना चाहता था कि उसने ऐसा लट्ठ मारा कि रहीम चक्कर खाकर बेसुध हो धरती पर गिर पड़ा। सुध आने पर उसने देखा कि कादिर वहां नहीं है, फिरकर देखता है तो पशुशाला का छप्पर जल रहा है, ज्वाला प्रचंड हो रही है और लपटें निकल रही हैं।
रहीम सिर पीटकर पुकराने लगा - भाइयो, यह क्या हुआ! हाय, मेरा सत्यानाश हो गया! चिल्लाते-चिल्लाते उसका कंठ बैठ गया। वह दौड़ना चाहता था, परन्तु उसकी टांगें लड़खड़ा गईं। वह धम से धरती पर गिर पड़ा, फिर उठा, घर के पास पहुंचते-पहुंचते आग चारों ओर फैल गई। अब क्या बन सकता है? भय से पड़ोसी भी अपना असबाब बाहर फेंकने लगे। वायु के वेग से कादिर के घर में भी आग जा लगी, यहां तक कि आधा गांव जलकर राख का ढेर हो गया। रहीम और कादिर दोनों का कुछ न बचा। मुर्गियां, हल, गाड़ी, पशु, वस्त्र, अन्न, भूसा आदि सब कुछ स्वाहा हो गया। इतना अच्छा हुआ कि किसी की जान नहीं गई।
आग रात भर जलती रही। वह कुछ असबाब उठाने भीतर गया, परन्तु ज्वाला ऐसी प्रचंड थी कि जा न सका। उसके कपड़े और दाढ़ी के बाल झुलस गए।
प्रातःकाल गांव के चौधरी का बेटा उसके पास आया और बोला - रहीम, तुम्हारे पिता की दशा अच्छी नहीं है। वह तुम्हें बुला रहे हैं। रहीम तो पागल हो रहा था, बोला - कौन पिता जी ?
चौधरी का बेटा - तुम्हारे पिता। इसी आग ने उनका काम तमाम कर दिया है। हम उन्हें यहां से उठाकर अपने घर ले गए थे। अब वह बच नहीं सकते। चलो, अंतिम भेंट कर लो।
रहीम उसके साथ हो लिया। वहां पहुंचने पर चौधरी ने बू़ढ़े को खबर दी कि रहीम आ गया है।
बू़ढ़े ने रहीम को अपने निकट बुलाकर कहा - बेटा, मैंने तुमसे क्या कहा था। गांव किसने जलाया?
रहीम - कादिर ने। मैंने आप उसे छप्पर में आग लगाते देखा था। यदि मैं उसी समय उसे पकड़कर पूले को पैरों तले मल देता, तो आग कभी न लगती।
बूढ़ा - रहीम, मेरा अन्त समय आ गया। तुमको भी एक दिन अवश्य मरना है, पर सच बतलाओ कि दोष किसका है?
रहीम चुप हो गया।
बूढ़ा - बताओ, कुछ बोलो तो, फिर यह सब किसकी करतूत है, किसका दोष है?
रहीम - (आंखों में आंसू भरकर) मेरा! पिताजी, क्षमा कीजिए, मैं खुदा और आप दोनों का अपराधी हूं।
बूढ़ा - रहीम!
रहीम - हां, पिताजी।
बूढ़ा - जानते हो अब क्या करना उचित है?
रहीम - मैं क्या जानूं, मेरा तो अब गांव में रहना कठिन है।
बूढ़ा - यदि तू परमेश्वर की आज्ञा मानेगा तो तुझे कोई कष्ट न होगा। देख, याद रख, अब किसी से न कहना कि आग किसने लगाई थी। जो पुरुष किसी का एक दोष क्षमा करता है, परमात्मा उसके दो दोष क्षमा करता है।
यह कहकर खुदा को याद करते हुए बू़ढ़े ने प्राण त्याग दिए।
रहीम का क्रोध शांत हो गया। उसने किसी को न बतलाया कि आग किसने लगाई थी। पहलेपहल तो कादिर डरता रहा कि रहीम के चुप रह जाने में भी कोई भेद है, फिर कुछ दिनों पीछे उसे विश्वास हो गया कि रहीम के चित्त में अब कोई बैरभाव नहीं रहा।
बस, फिर क्या था - प्रेम में शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। वे पासपास घर बनाकर पड़ोसियों की भांति रहने लगे।
रहीम अपने पिता का उपदेश कभी न भूलता था कि फैलने से पहले ही चिनगारी को बुझा देना उचित है। अब यदि कोई कष्ट देता, तो वह बदला लेने की इच्छा नहीं करता। यदि कोई उसे गाली देता, तो सहन करके वह यह उपदेश करता कि कुवचन बोलना अच्छा नहीं। अपने घर के प्राणियों को भी वह यही उपदेश दिया करता। पहले की अपेक्षा अब उसका जीवन बड़े आनन्दपूर्वक कटता है।

Monday, 26 November 2012

फायकू


फायकू



1

गुनाहों की हर तरकीब
मुझे आजमाने दो
तुम्हारे लिये

2

जमाने भर की दुआ
तुम्हें देता हूँ
तुम्हारे लिये

3

सच सबके सामने बोला
और पिट गया
तुम्हारे लिये

4

रात दिन दिन रात
करता रहा काम
तुम्हारे लिये

5

यहां वहां जहां तहां
खुद को ढूंढा
तुम्हारे लिये

6

तुम आओ ना आओ
हम तो आयेंगे
तुम्हारे लिये

7

दो सौ फायकू लिखो
किताब मुफ्त छपे
तुम्हारे लिये

8

आज का दिन हुआ
तुम्हारे ही नाम
तुम्हारे लिये

9

जेब में नहीं कुछ
दिल राजा है
तुम्हारे लिये

10

राजनीति हो गयी छलिया
नेता सब बेमाने
तुम्हारे लिये

11

रात हो गयी अंधियारी
जैसे भारतीय राजनीति
तुम्हारे लिये

12

आसमान में कड़कती बिजली
बेतरतीब धड़कता दिल
तुम्हारे लिये

13

मतदाताओं पीनी है चाय
संसद में जाकर
तुम्हारे लिये

14

मैं करता हूं प्यार
बार बार यार
तुम्हारे लिये

15

जवां दिलों की धड़कन
बे मतलब नहीं
तुम्हारे लिये

16

दिल विल प्यार व्यार
सब हैं बेकरार
तुम्हारे लिये

17

मुझे जल्दी करने दो
धैर्य छोड़ दिया
तुम्हारे लिये

18

दारू दारू करता है
दीवाना जमकर पीता
तुम्हारे लिये

19

दोहा चैपाई गीत ग़ज़ल
कुछ भी लिखूं
तुम्हारे लिये

20

नव प्रभात नव बेला
शुभ शुभ हो
तुम्हारे लिये

21

कमाल हो गया है
साथ तुम्हारा मिला
तुम्हारे लिये

22

सच कहूं रात सोया
नहीं जागता रहा
तुम्हारे लिये

23

सपने में भी आते 
फायकू निराले निराले
तुम्हारे लिये

24

जीतकर हार जाता हूं
हारकर जीतता हूं
तुम्हारे लिये

25

हो गयी है पीर
पर्वत सी विशाल
तुम्हारे लिये

26

जिन्दगी बहुत है मगर
खुशियां दो चार
तुम्हारे लिये

27

कविता रसीली है मगर
फायकू सी कहां
तुम्हारे लिये

28

कवियों फायकू कहो यह
मजे से भरपूर
तुम्हारे लिये

29

नैट वैट गैट जैट
सब के सब
तुम्हारे लिये

30

आज फिर कहना है
फायकू दो चार
तुम्हारे लिये

31

रोके से रुके नहीं
फायकू आते जायें 
तुम्हारे लिये

Monday, 19 November 2012

आज की कविता



आज की कविता



जलाकर हमें जो 
समझ रहे स्वयं को सुरक्षित
भूल है  उनकी यह
हमारे अन्तरमन की आग 
फैल जाएगी उनके चारो ओर
कर देगी उन्हें धुएं से सराबोर
नाक और मुँह से कड़वा धुआं
जब पहुँच जाएगा उनके पेट में
तब,
हम तो मरेंगे चीखों के साथ
अग्नि में जलकर
मगर वो खांसते हुए
मौत की भीख मांगते हुए
रह जायेंगे फिर ज़िन्दे
हमारी लाशे गिनने के लिए

Sunday, 18 November 2012

मेरी चार कविताएं


मेरी चार कविताएं


1

हाँ मैं,
दिये सा जलना चाहता हूँ ,
बर्फ सा पिघलना चाहता हूँ ,
रात दिन घुटघुट कर भी
तेरे लिये जीना चाहता हूँ ,
रोने और हंसने की बात नहीं
अपने पराये की पहचान नहीं
फिर भी तेरे, सिर्फ तेरे लिये
लिख-लिखकर गाना चाहता हूँ ,
खुद को खुद ही से मिलाना है ,
और तुझे भी अपना बनाना है ,
देख ले मुझे सारी दुनिया,
अंधेरों में चमकना चाहता हूँ ,
गुनहगार मैं नहीं तो कौन है ?
तू हमराज नहीं तो कौन है ?
तेरे मेरे गुनाहों की सब सजा
मैं ही पाना चाहता हूँ ,
रात सा ढला हूँ मैं ,
सूरज सा चला हूँ मैं ,
तेरे प्यार की खातिर
कितना जला हूँ मैं
तू कितना पास है मेरे?
फिर भी हाथ नहीं आता
दूर और दूर चला जाता
तुझे पाने के लिये अब
दिन सा ढलना चाहता हूँ।


2

बकरी का नन्हा सा बच्चा
बकरी के आगे आगे चरता
बकरी तब तक चरती रहती
जब तक बच्चे का पेट भरता

अगले घुटने टेक बकरी
बच्चे को देख देख चरती
नन्हा और प्यारा बच्चा
निरन्तर उछल कूद करता

पतली टांगो वाला बच्चा
जब माँ के साथ घर जाता
बकरी खूंटे से बंध जाती
बच्चा दूध को ललचाता

बकरी आँखों में नीर लिए
खड़ी रहती थनों में दूध लिए
मालिक लोटा लिए आता
बच्चा उछल उछल जाता

बच्चे का बंधन खुल जाता
वो अपने होंठों में थन दबाता
बकरी धन्य हो जाती
बच्चा भी खुश हो जाता

तभी बच्चे को मालिक हटाता
बकरी का दूध चट कर जाता
बकरी मजबूर रह जाती
बच्चा भी बेबस हो जाता

बच्चा खा पी बड़ा हो जाता
तब तक छोटा भाई आ जाता
बकरी की आँखों में पानी आता
बच्चा रहस्य नहीं समझ पाता

जब मालिक त्यौहार मनाता
बच्चे की गरदन पर छुरा आता
तब माँ की आँखों का पानी
उसको अच्छी तरह समझ आता


3

परिंदों के कूकने, कूलने
या चहचहाने की आवाज़
सोचने पर कर देती है मजबूर
उनके फड़फड़ाने,
दिवार से टकराने की आवाज़
दिवारें,
दो वस्तुओं के बीच की नहीं
बुलन्द इमारतों की खंडहर दिवारें

शान्ति मिलती है
इन भूतहा दिवारों में
जैसे  कोई आत्मा,
अस्तित्व तलाशती है
इन खंडहर दिवारों में
आह!
हवा का तेज़ और ठण्डा झौंका
बड़े और भारी पत्थरों से टकराता
दीवारों पे धूल से इबारत लिखता
अपढ, रहस्यमयी और
अनजानी इबारत
पढ लेती हैं,
खंडहर हुई विशाल इमारत
घटनाओं - दुर्घटनाओं की कहानी
पाप और पुण्य की अन्तर कहानी
इन दिवारों को लाँघती हुई
फैल जाती है दावानल की भाँति।

काल जिसे रोक नहीं पाता
और इन
छोटी - बड़ी कहानियों का
खंडहर हुई दिवारों का
विशाल इतिहास बन जाता है।


4

तुम्हारा क्रोध,
मुझे डरा नहीं सकता,
तुम्हारे हाथ का पत्थर
नष्ट नहीं कर पाएगा,
जैसा है वैसा ही कहूँगा,
चेहरे के बदलते भावों को,
छिपा नहीं पाओंगे
और अगर पत्थर मारकर
ग़र तोड़ भी पाओगे
आईना हूँ
अपने ही हज़ार अक्स पाओगे

Friday, 16 November 2012

मेरी चार ग़ज़लें





मेरी चार ग़ज़लें

1

उदास रातों को देखा है मैंने।
तुझे बहुत पास देखा है मैंने।।
जब भी जी चाहा चूम लिया।
हर इक शय में देखा है मैंने।।
नफ़रत करने के लायक नहीं।
बड़े प्यार से तुझे देखा है मैंने।।
सच बता इतना हँसता क्यों है।
दर्द तेरे सीने में देखा है मैंने।।
जाने का नाम मत लेना ‘अमन’।
हथेली में सफ़र देखा है मैंने।।

2

हर बार मैं ही हारा हूँ।
छप्पर का सहारा हूँ।।
टूटा हूँ मेरी किस्मत।
दरिया का किनारा हूँ।।
यूँ ही देखता नही कोई।
ख़ूबसूरत नजारा हूँ।।
तुझे धोखा हुआ होगा।
गिनती नहीं पहाड़ा हूँ।।
बेअम्नी इस दुनिया में।
‘अमन’ बनके हारा हूँ।।

3

मुझे जीने का मौका तो दिया होता।
फिर चाहे सारा लहु पी लिया होता।।
मेरी साफ़गोई की सजा मिली मुझे।
काश मैंने होंठों को सी लिया होता।।
इल्ज़ाम लगाके औक़ात दिखा दी।
मेरा हिस्सा भी तूने ले लिया होता।।
मुझसे पीने के लिये कहा तो होता।
अगर ज़हर था मैंने पी लिया होता।।
राम सा वनवास काट लेता ‘अमन’।
बाइज्ज़त घर से निकाल दिया होता।।

4

दुनिया को दहलीज़ बना लिया है।
हर चीज़ को नाचीज़ बना लिया है।।
हौसला देखलें अब देखने वाले।
आसमां को छत बना लिया है।।
गिरने का अब डर भी नही रहा।
धरती को बिछोना बना लिया है।।
मौत से भी अब डर नहीं लगता।
मौत को सहारा बना लिया है।।
चाहे तो चल साथ मेरे ‘अमन’।
दुश्मनों को हमराह बना लिया है।।

- अमन कुमार त्यागी